छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ततः किम्? इत्युच्यते—अथ य उक्तलक्षणयोः प्राणापानयोः सन्धिस्तयोरन्तरा वृत्तिविशेषः, स व्यानः; यः सांख्यादिशास्त्रप्रसिद्धः श्रुत्या विशेषनिरूपणान्नासौ व्यान इत्यभिप्रायः । | इससे क्या सिद्ध हुआ ? यह बतलाया जाता है—उन उपर्युक्त लक्षणवाले प्राण और अपानकी जो सन्धि है—उनके बीचका जो वृत्तिविशेष है, वह व्यान है । श्रुतिद्वारा विशेषरूपसे निरूपण किये जानेके कारण यहाँ वह व्यान अभिप्रेत नहीं है जो सांख्यादि शास्त्रमें प्रसिद्ध [ सर्वदेहव्यापी ] व्यान है ऐसा इसका तात्पर्य है । | | कस्मात्पुनः प्राणापानौ हित्वा महतायासेन व्यानस्यैवोपासनमुच्यते ? वीर्यवत्कर्महेतुत्वात् । कथं वीर्यवत्कर्महेतुत्वमित्याह—<br><br>यो व्यानः सा वाक्, व्यानकार्यत्वाद्वाचः । यस्माद्व्याननिर्वर्त्या वाक्तस्मादप्राणन्ननपानन्प्राणापानव्यापारावकुर्वन्वाचमभिव्याहरत्युच्चारयति लोकः ॥ ३ ॥ | किंतु प्राण और अपानको छोड़कर अत्यन्त परिश्रमसे व्यानकी ही उपासनाका निरूपण क्यों किया गया ? [ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—]<br>क्योंकि यह वीर्यवान् कर्मकी निष्पत्तिका कारण है । यह वीर्यवान् कर्मकी सिद्धिका कारण कैसे है ? इसपर कहते हैं—जो व्यान है, वही वाणी है, क्योंकि वाणी व्यानका ही कार्य है । वाणी व्यानसे निष्पन्न होनेवाली है, इसलिये लोक प्राण और अपानन अर्थात् प्राण और अपानकी क्रियाएँ न करता हुआ वाणीका अभिव्याहरण—उच्चारण करता है ॥ ३ ॥ |