भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 729

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
व्यापकत्वात्ततो भूयो भवति । यथा वै लोके द्वे वामलके फले द्वे वा कोले बदरफले द्वौ वाक्षौ बिभीतकफले मुष्टिरनुभवति मुष्टिस्ते फले व्याप्नोति मुष्टौ हि ते अन्तर्भवतः । एवं वाचं च नाम चामलकादिवन्मनोऽनुभवति ।उसकी अपेक्षा वह व्यापक होनेके कारण, बड़ा होता है । लोकमें जिस प्रकार दो आँवलों; दो कोलों—बेरों अथवा दो अक्षों—बहेड़ेके फलों—को मुट्ठी अनुभव करती है—उन फलोंको मुट्ठी व्याप्त कर लेती है अर्थात् वे मुट्ठीके अन्तर्गत हो जाते हैं, उसी प्रकार उन आँवले आदिके समान वाणी और नाम—इन दोनोंको मन अनुभव करता है ।
स यदा पुरुषो यस्मिन्काले मनसान्तःकरणेन मनस्यति मनस्यनं विवक्षाबुद्धिः कथम् ? मन्त्रानधीयीयोच्चारयेयमित्येवं विवक्षां कृत्वाथाधीते तथा कर्माणि कुर्वीयेति चिकीर्षाबुद्धिं कृत्वाथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेति प्राप्तीच्छां कृत्वा तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानेनाथेच्छते पुत्रादीन्प्राप्नोतीत्यर्थः । तथेमं च लोकममुं चोपायेनेच्छेयेतिवह (यह) पुरुष जब—जिस समय मन-अन्तःकरणसे मनस्यन (कुछ कहनेकी इच्छा) करता है, मनस्यन-का अर्थ है विवक्षा-बुद्धि (कुछ कहनेकी इच्छा या विचार) किस प्रकार ? यह बताते हैं—'मैं मन्त्रोंका पाठ—उच्चारण करूँ,' इस प्रकार बोलनेकी इच्छा करके वह पाठ करता है; 'मैं कर्म करूँ,' ऐसी चिकीर्षाबुद्धि करके कर्म करता है; तथा 'मैं पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ,' इस प्रकार उनकी प्राप्तिकी इच्छा करके उनकी प्राप्तिके उपायका अनुष्ठान कर उनकी इच्छा करता है अर्थात् उन पुत्रादिको प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार 'मैं इस लोक और परलोक-को उपायद्वारा [ प्राप्त करना ]