छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 756, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम खण्ड
अन्नकी अपेक्षा जलका महत्त्व
आपो वावान्नाद्भूयस्यस्तस्माद्यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद्द्यौर्यत्पर्वता यद्देवमनुष्या यत्पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥
जल ही अन्नकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। इसीसे जब सुवृष्टि नहीं होती तो प्राण [ इसलिये ] दुखी हो जाते हैं कि अन्न थोड़ा होगा। और जब सुवृष्टि होती है तो यह सोचकर कि खूब अन्न होगा प्राण प्रसन्न हो जाते हैं। यह जो पृथिवी है मूर्तिमान् जल ही है तथा जो अन्तरिक्ष, जो द्युलोक, जो पर्वत, जो देव-मनुष्य, जो पशु और पक्षी तथा जो तृण, वनस्पति, श्वापद और कीट-पतंग-पिपीलिकापर्यन्त प्राणी हैं वे भी मूर्तिमान् जल ही हैं। अतः तुम जलकी उपासना करो ॥ १ ॥
| आपो वावान्नाद्भूयस्योऽन्नकारणत्वात्। यस्मादेवं तस्माद्यदा यस्मिन्काले सुवृष्टिः सस्यहिता शोभना वृष्टिर्न भवति तदा | अन्नका कारण होनेसे जल ही अन्नकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। क्योंकि ऐसा है, इसीलिये जिस समय सुवृष्टि—अन्नके लिये हितावह सुन्दर वृष्टि नहीं होती उस समय |
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