भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 755

खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५१


स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान्पान-
वतोऽभिसिध्यति यावदन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो
भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नाद्भूय
इत्यन्नाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २॥

वह जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे अन्नवान् और पानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक अन्नकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि अन्नकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या अन्नसे बढ़कर भी कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'अन्नसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवन् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥

| फलं चान्नवतः प्रभूतान्नान्वौ स लोकान्पानवतः प्रभूतोदकां-श्चान्नपानयोर्नित्यसम्बन्धाल्लो-कानभिसिध्यति । समानमन्यत् ॥ २ ॥ | ( उसे प्राप्त होनेवाला ) फल—वह अन्नवान्—अधिक अन्नवाले और पानवान्—बहुत जलवाले लोकोंको, क्योंकि अन्न और जलका नित्य सम्बन्ध है, प्राप्त होता है। शेष पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥