भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 978 में से

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पृष्ठ 754
७५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
यते यद्यु ह जीवेद् दृश्यन्ते हि मासमप्यनश्नन्तो जीवन्तोऽथवा स जीवन्नप्यद्रष्टा भवति गुरोरपि तत एवाश्रोतेत्यादि पूर्वविपरीतं सर्वं भवति । <br><br> अथ यदा बहून्यहान्यनशितो दर्शनादिक्रियास्वसमर्थः सन्नन्नस्यायी । आगमनमायोऽन्नस्य प्राप्तिरित्यर्थः सा यस्य विद्यते सोऽन्नस्यायी । 'आय' इत्येतद्वर्णव्यत्ययेन । अथान्नस्याया इत्यपि पाठ एवमेवार्थः । द्रष्टेत्यादिकार्यश्रवणात् । दृश्यते ह्यन्नोपयोगे दर्शनादिसामर्थ्यं न तदप्राप्तावतोऽन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥मरे—जीवित रह जाय, क्योंकि महीनेभर न खानेवाले भी जीवित रहते देखे जाते हैं, तो [ऐसी अवस्थामें] जीवित रहनेपर वह गुरुका भी दर्शन न करनेवाला हो जाता है तथा उनसे श्रवण करनेवाला भी नहीं रहता—इत्यादि सब बात पहलेसे विपरीत हो जाती है। <br><br> फिर जब बहुत दिन भोजन न करनेपर दर्शनादि क्रियाओंमें असमर्थ रहनेपर अन्नका आयी—आगमनका नाम ‘आय’ अर्थात् ‘अन्नकी प्राप्ति’ है, वह जिसे होती है उसे ‘अन्नका आयी’ कहते हैं। श्रुतिमें जो ‘आयै’ ऐसा पाठ है वह ‘आयी’ का वर्णव्यत्यय करके है तथा ‘अन्नस्याया’ ऐसा पाठ भी इसी अर्थमें समझना चाहिये, क्योंकि श्रुति द्रष्टा-श्रोता आदि कार्यका प्रतिपादन करती है। अन्नका उपयोग करनेपर ही दर्शनादिकी शक्ति देखी जाती है—उसकी अप्राप्ति होनेपर नहीं। अतः तुम अन्नकी उपासना करो ॥ १ ॥
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