छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 753, कुल 978 में से
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नवम खण्ड
बलकी अपेक्षा अन्नकी प्रधानता
अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नी-
याद्यद्यु ह जीवेदथवाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता
भवत्यथान्नस्यायै द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता
भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमु-
पास्स्वेति ॥ १ ॥
अन्न ही बलसे उत्कृष्ट है। इसीसे यदि दश दिन भोजन न करे और जीवित भी रह जाय तो भी वह अद्रष्टा, अश्रोता, अमन्ता, अबोद्धा अकर्ता और अविज्ञाता हो ही जाता है। फिर अन्नकी प्राप्ति होनेपर ही वह द्रष्टा होता है, श्रोता होता है, मनन करनेवाला होता है, बोद्धा होता है, कर्ता होता है और विज्ञाता होता है। तुम अन्नकी उपासना करो ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्नं वाव बलाद्भूयः; बलहेतुत्वात्। कथमन्नस्य बलहेतुत्वम्? इत्युच्यते—यस्माद्बलकारणमन्नं तस्माद्यद्यपि कश्चिद्दशरात्रीर्नाश्रीयात्सोऽन्नोपयोगनिमित्तस्य बलस्य हान्या म्रियते न चेन्म्रिय- | अन्न ही बलसे उत्कृष्ट है, क्योंकि यह बलका कारण है। अन्न बलका कारण किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं—क्योंकि अन्न बलका कारण है इसलिये यदि कोई पुरुष दश राततक भोजन न करे तो वह अन्नके उपयोगसे होनेवाले बलके क्षीण हो जानेके कारण मर जाता है; और यदि न |