छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 761, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५७
| इत्याद्युक्तार्थम् । अतस्तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | वाक्यका अर्थ ऊपर कहा जा चुका है।<br><br>अतः तुम तेजकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति । यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह तेजस्वी होकर तेजःसम्पन्न, प्रकाशमान और तमोहीन लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक तेजकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] भगवन् ! क्या तेजसे भी बढ़कर कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'तेजसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥
| तस्य तेजस उपासनफलं तेजस्वी वै भवति । तेजस्वत एव च लोकान्भास्वतः प्रकाशवतोऽपहततमस्कान्वा ह्याध्यात्मिकाज्ञानाद्यपनीततमस्कानभिसिध्यति । ऋज्वर्थमन्यत् ॥ २ ॥ | उस तेजकी उपासनाका फल—वह निश्चय तेजस्वी हो जाता है तथा जो तेजःसम्पन्न ही लोक हैं उन भास्वान्—प्रकाशवान् और अपहततमस्क—बाह्य— [रात्रि आदि] और आध्यात्मिक—अज्ञानादि ऐसे अन्धकारोंसे रहित लोकोंको प्राप्त कर लेता है। शेष सबका अर्थ सरल है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥