छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 760, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७ |
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| गृह्णावष्टभ्य स्वात्मना निश्चलीकृत्य वायुमाकाशमभितपत्याकाशमभिव्याप्तवत्तपति यदा तदाहुर्लौकिका निशोचति सन्तपति सामान्येन जगन्नितपति देहानतो वर्षिष्यति वा इति । प्रसिद्धं हि लोके कारणमभ्युद्यतं दृष्टवतः कार्यं भविष्यतीति विज्ञानम् । तेज एव तत्पूर्वमात्मानमुद्भूतं दर्शयित्वाथानन्तरमपः सृजतेऽतोऽप्स्रष्टृत्वादूढ्योऽद्भ्यस्तेजः । | तेज जिस समय वायुको आगृहीत—आश्रित कर अर्थात् अपनेद्वारा वायुको निश्चल कर आकाशको अभितप्त करता है—आकाशको सब ओरसे व्याप्त करके संतप्त करता है उस समय लौकिक पुरुष कहते हैं—'जगत् सामान्यरूपसे संतप्त हो रहा है, देहोंमें अत्यन्त ताप है; अतः वर्षा होगी। कारणको अभ्युदित हुआ देखनेवालोंको ऐसी बुद्धि होना कि 'कार्य होगा' लोकमें प्रसिद्ध ही है। [इस प्रकार] तेज ही पहले अपनेको उद्भूत हुआ दिखलाकर फिर उसके पश्चात् जल उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार जलका स्रष्टा होनेके कारण जलकी अपेक्षा तेज उत्कृष्टतर है। | | किञ्चान्यत्तदेतत्तेज एव स्तनयित्नुरूपेण वर्षहेतुर्भवति । कथम् ? ऊर्ध्वाभिश्चोर्ध्वगाभिर्विद्युद्भिस्तिरश्चीभिश्च तिर्यग्गताभिश्च सहाह्रादाः स्तनयनशब्दाश्चरन्ति । तस्मात्तद्दर्शनादाहुर्लौकिका विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा | इसके सिवा [दूसरे प्रकारसे भी] तेज ही बिजलीके रूपमें वर्षाका हेतु होता है। किस प्रकार—ऊर्ध्वा—ऊर्ध्वगामिनी और तिरश्ची—तिर्यग्गामिनी बिजलियोंके सहित 'आह्राद'—गड़गड़ाहटके शब्द फैल जाते हैं; अतः ऐसा देखकर लौकिक पुरुष कहते हैं—'बिजली चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा, होगी' इत्यादि |