छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 759, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादश खण्ड
जलकी अपेक्षा तेजकी प्रधानता
तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाश-
मभितपति तदाहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा
इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तदेतदूर्ध्वा-
भिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युद्भिराह्रादाश्चरन्ति तस्मा-
दाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव
तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥
तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। वह यह तेज जिस समय वायुको निश्चल कर आकाशको सब ओरसे तप्त करता है उस समय लोग कहते हैं—'गर्मी हो रही है, बड़ा ताप है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको उद्भूत हुआ दिखलाकर फिर जलकी उत्पत्ति करता है। वह यह तेज ही वर्षाका हेतु है। जब ऊर्ध्वगामी और तिर्यग्गामी विद्युत्के सहित गड़गड़ाहटके शब्द फैल जाते हैं, तब उससे प्रभावित होकर लोग कहते हैं—'बिजली चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको प्रदर्शित कर फिर जलको उत्पन्न करता है। अतः तेजकी उपासना करो ॥ १ ॥
| तेजो वावाद्भ्यो भूयः, तेजसोऽप्कारणत्वात् । कथ-मप्कारणत्वम् ? इत्याह— यस्मादब्योनिस्तेजस्तस्मा-त्तद्वा एतत्तेजो वायुमा- | तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है, क्योंकि तेज जलका कारण है। वह जलका कारण किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं—क्योंकि तेज जलका कारण है इसलिये वह यह |
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