छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 794, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथ यत्राविद्याविषयेऽन्योऽन्येनान्यत्पश्यतीति तदल्पमविद्याकालभावीत्यर्थः । यथा स्वप्नदृश्यं वस्तु प्राक् प्रबोधात्तत्कालभावीति तद्वत् । तत एव तन्मर्त्यं विनाशि स्वप्नवस्तुवदेव तद्विपरीतो भूमा यस्तदमृतम् । तच्छब्दोऽमृतत्वपरः । | किंतु जहाँ अविद्याके राज्यमें अन्य अन्यको अन्यके द्वारा देखता है वह अल्प है, तात्पर्य यह है कि वह केवल अविद्याके समय ही रहनेवाला है । जिस प्रकार स्वप्नमें दिखलायी देनेवाली वस्तु जागनेसे पूर्व स्वप्नकालमें ही रहनेवाली होती है उसी प्रकार [ उसे जानना चाहिये । इसीसे वह स्वप्नके पदार्थके समान ही मर्त्य—विनाशी है । उसके विपरीत जो भूमा है वह अमृत । 'तत्' शब्द अमृतत्वपरक है [ इसीसे नपुंसकलिङ्गका प्रयोग किया गया ] । | | स तर्ह्येवंलक्षणो भूमा हे भगवन् कस्मिन् प्रतिष्ठित इत्युक्तवन्तं नारदं प्रत्याह सनत्कुमारः—स्वे महिम्नीति; स्व आत्मीये महिम्नि माहात्म्ये विभूतौ प्रतिष्ठितो भूमा। यदि प्रतिष्ठामिच्छसि क्वचिद्यदि वा परमार्थमेव पृच्छसि न महिम्न्यपि प्रतिष्ठित इति ब्रूमः । | 'तो, हे भगवन् ! वह ऐसे लक्षणवाला भूमा किसमें प्रतिष्ठित है ?' इस प्रकार पूछते हुए नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा—'अपनी महिमामें।' तो वह भूमा 'स्वे'—अपनी 'महिम्नि'—महिमा अर्थात् विभूतिमें प्रतिष्ठित है । और यदि कहीं उसकी प्रतिष्ठा जानना चाहते हो—अथवा यदि परमार्थतः ही पूछते हो तो हमारा यह कथन है कि वह अपनी महिमामें भी प्रतिष्ठित नहीं |