भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 797, कुल 978 में से

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पृष्ठ 797

पञ्चविंश खण्ड

—: ० :—

सर्वत्र भूमा ही है

कस्मात्पुनःक्वचिन्न प्रतिष्ठितः ? <br><br> इत्युच्यते—यस्मात्—तो फिर ऐसा क्यों कहा जाता है वह कहीं प्रतिष्ठित नहीं है ? <br><br> सो बतलाते हैं; क्योंकि—

स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेद१ँसर्वमित्यथातोऽहङ्कारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेद१ँसर्वमिति ॥ १ ॥

वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है, वही दायीं ओर है, वही बायीं ओर है और वही यह सब है। अब उसीमें अहंकारादेश किया जाता है—मैं ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मैं ही पीछे हूँ, मैं ही आगे हूँ, मैं ही दायीं ओर हूँ, मैं ही बायीं ओर हूँ और मैं ही यह सब हूँ ॥ १ ॥

स एव भूमाधस्तान्न तद्व्यतिरेकेणान्यद्विद्यते यस्मिन्प्रतिष्ठितः स्यात् तथोपरिष्टादित्यादि समानम् । सति भूम्नोऽन्यस्मिन्भूमा हि प्रतिष्ठितः स्यान्न तु तदस्ति । स एव तु सर्वम् । अतस्तस्मादसौ न क्वचित्प्रतिष्ठितः ।क्योंकि वह भूमा ही नीचे है, उससे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु नहीं है जिसपर वह प्रतिष्ठित हो । इसी प्रकार 'उपरिष्टात्' इत्यादिका अर्थ भी समझना चाहिये । भूमासे भिन्न कोई और पदार्थ हो तो भूमा उसपर प्रतिष्ठित हो; किंतु ऐसा है नहीं । सब कुछ वही है । अतः इसीसे वह कहीं अन्यत्र प्रतिष्ठित नहीं है ।