छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 799, कुल 978 में से
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खण्ड २५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५
येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषाꣳ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥
अब आत्मरूपसे ही भूमाका आदेश किया जाता है । आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है, आत्मा ही दायीं ओर है, आत्मा ही बायीं ओर है और आत्मा ही यह सब है । वह यह इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार मनन करनेवाला तथा विशेषरूपसे इस प्रकार जाननेवाला आत्मरति, आत्मक्रीड, आत्ममिथुन और आत्मानन्द होता है; वह स्वराट् है; सम्पूर्ण लोकोंमें उसकी यथेच्छ गति होती है । किंतु जो इससे विपरीत जानते हैं वे अन्यराट् (जिनका राजा अपनेसे भिन्न कोई और है, ऐसे) और क्षय्यलोक (क्षयशील लोकोंको प्राप्त होनेवाले) होते हैं । उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति नहीं होती ॥ २ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथानन्तरमात्मादेश आत्मनैव केवलेन सत्स्वरूपेण शुद्धेनादिश्यते । आत्मैव सर्वतः सर्वमित्येवमेकमजं सर्वतो व्योमवत्पूर्णमनन्यशून्यं पश्यन्स वा एष विद्वान्मननविज्ञानाभ्यामात्मरतिरात्मन्येव रती रमणं यस्य सोऽयमात्मरतिः। तथात्मक्रीडः। देहमात्रसाधना रतिर्बाह्यसाधना क्रीडा । लोके स्त्रीभिः सखिभिश्च | अब आगे आत्मादेश है अर्थात् केवल सत्स्वरूप शुद्ध आत्माके द्वारा ही आदेश किया जाता है । सब ओर सब कुछ आत्मा ही है । इस प्रकार आकाशके समान सर्वत्र पूर्ण एक अज और अनन्य आत्माको देखनेवाला वह यह विद्वान् मनन और विज्ञानके कारण आत्मरति—आत्मामें ही जिसकी रति अर्थात् रमण है ऐसा आत्मरति और आत्मक्रीड होता है । रतिका साधन केवल देह है और क्रीडा बाह्य साधनवाली होती है, क्योंकि लोकमें 'स्त्रियों और मित्रोंके साथ क्रीडा |