छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 841, कुल 978 में से
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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३७
| शाङ्करभाष्य | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| कर्तुरनुरूपं विदधता विधृतम् । अध्रियमाणं हीश्वरेणेदं विश्वं विनश्येद्यतस्तस्मात्स सेतुर्विधृतिः। | फलादि भेदके नियमोंद्वारा धारण किया गया है; क्योंकि ईश्वरद्वारा धारण न किये जानेपर यह विश्व नष्ट हो जाता, इसलिये वह इसे धारण करनेवाला सेतु है । |
| किमर्थं स सेतुरित्याह—एषां भूरादीनां लोकानां कर्तृकर्मफलाश्रयाणामसंभेदायाविदारणायाविनाशायेत्येतत् । किंविशिष्टश्चासौ सेतुरित्याह । नैतं सेतुमात्मानमहोरात्रे सर्वस्य जनिमतः परिच्छेदके सती नैतं तरतः । यथान्ये संसारिणः कालेनाहोरात्रादिलक्षणेन परिच्छेद्या न तथायं कालपरिच्छेद्य इत्यभिप्रायः । “यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते” (बृ० उ० ४ । ४ । १६) इति श्रुत्यन्तरात् । | वह सेतु क्यों है ? इसपर श्रुति कहती है कि कर्ता और कर्मफलके आश्रयभूत इन भूलोक आदि लोकोंके असम्भेद-अविदारण अर्थात् अविनाश ( रक्षा ) के लिये यह सेतु है । यह सेतु किस विशेषणवाला है ? इसपर श्रुति कहती है—इस आत्मारूप सेतुको दिन और रात सम्पूर्ण उत्पत्तिशील पदार्थोंके परिच्छेदक होनेपर भी अतिक्रमण नहीं करते । जिस प्रकार अन्य संसारी पदार्थ अहोरात्रादिरूप कालसे परिच्छेद्य हैं उस प्रकार यह कालपरिच्छेद्य नहीं है—ऐसा इसका अभिप्राय है; जैसा कि “जिस ( परमात्मा ) से नीचे संवत्सर दिनोंके रूपमें परिवर्तित होता रहता है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । |
| अत एवैनं न जरा तरति न प्राप्नोति तथा । न मृत्युर्न शोको | इसीसे इसे जरा नहीं तरती; अर्थात् प्राप्त नहीं होती। इसी प्रकार न मृत्यु, न शोक, न सुकृत-दुष्कृत |