छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 842, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| न सुकृतं न दुष्कृतं सुकृतदुष्कृते धर्माधर्मौ। प्राप्तिरत्र तरणशब्देनाभिप्रेता नातिक्रमणम्। कारणं ह्यात्मा। न शक्यं हि कारणातिक्रमणं कर्तुं कार्येण। अहोरात्रादि च सर्वं सतः कार्यम्। अन्येन ह्यन्यस्य प्राप्तिरतिक्रमणं वा क्रियेत। न तु तेनैव तस्य। न हि घटेन मृत्प्राप्यतेऽतिक्रम्यते वा। | और न धर्माधर्म ही प्राप्त होते हैं। यहाँ 'तरण' शब्दसे प्राप्ति अभिप्रेत है, अतिक्रमण नहीं; क्योंकि आत्मा कारण है और कार्यके द्वारा कारणका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। दिन और रात्रि आदि ये सब सत्के ही कार्य हैं; और अन्यके द्वारा अन्यकी ही प्राप्ति अथवा अतिक्रमण किया जाता है, अपने द्वारा अपनी ही प्राप्ति या अतिक्रमण नहीं किया जाता—घटके द्वारा मृत्तिका प्राप्त या अतिक्रान्त नहीं की जा सकती। | | यद्यपि पूर्वं य आत्मापहतपाप्मेत्यादिना पाप्मादिप्रतिषेध उक्त एव तथापीहायं विशेषो न तरतीति प्राप्तिविषयत्वं प्रतिषिध्यते। तत्राविशेषेण जराद्यभावमात्रमुक्तम्। अहोरात्राद्या उक्ता अनुक्ताश्चान्ये सर्वे पाप्मान उच्यन्तेऽतोऽस्मादात्मनः सेतोर्निवर्तन्तेऽप्राप्यैवेत्यर्थः। अपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक उक्तः ॥ १ ॥ | यद्यपि पहले 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि वाक्यसे पाप आदिका प्रतिषेध कर दिया गया है तथापि यहाँ यह विशेषता है कि 'न तरति' इस वाक्यसे आत्माके प्राप्ति-विषयत्वका प्रतिषेध किया जाता है। उसमें सामान्यरूपसे जरादिका अभावमात्र बतलाया गया है। पूर्वोक्त दिन और रात्रि आदि तथा अन्य अनुक्त पदार्थ सभी पाप कहे जाते हैं। अतः वे इस आत्मारूप सेतुसे इसे प्राप्त किये बिना ही निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक—जिसमें ब्रह्म ही लोक है—अपहतपाप्मा कहा गया है ॥ १ ॥ |