छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 935, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९११
अथ यत्रैतदाकाशमनुविषष्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदँशृणवानोति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥
जिसमें यह चक्षुद्वारा उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है; उसके रूपग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है। जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ वह आत्मा है; उसके गन्धग्रहणके लिये नासिका है और जो ऐसा समझता है कि मैं यह शब्द बोलूँ वही आत्मा है; उसके शब्दोच्चारणके लिये वागिन्द्रिय है तथा जो ऐसा जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ, वह भी आत्मा है, श्रवण करनेके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है ॥ ४ ॥
| भाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथ यत्र कृष्णतारोपलक्षित-<br>माकाशं देहच्छिद्रमनुविषष्णम-<br>नुषक्तमनुगतं तत्र स प्रकृतो-<br>ऽशरीर आत्मा चाक्षुषश्चक्षुषि भव<br>इति चाक्षुषस्तस्य दर्शनाय रूपो-<br>पलब्धये चक्षुः करणम्; यस्य तद्दे-<br>हादिभिः संहतत्वात्परस्य द्रष्टुरर्थे,<br>सोऽत्र चक्षुषि दर्शनेन लिङ्गेन<br>दृश्यते परोऽशरीरोऽसंहतः। | जहाँ (जिस जाग्रदवस्था में) यह कृष्णतारोपलक्षित आकाश देहान्तर्वर्ती छिद्रमें अनुविषष्ण—अनुषक्त अर्थात् अनुगत है उस अवस्थामें यह प्रकृत अशरीर आत्मा चाक्षुष—चक्षुमें रहनेवाला है इसलिये चाक्षुष है। उसके देखने—रूपोपलब्धि करनेके लिये चक्षु करण है। देहादिसे संहत होनेके कारण जिसपर द्रष्टाके लिये चक्षु यह करण है वह पर अशरीर आत्मा इस नेत्रके अन्तर्गत दर्शनरूप लिङ्गसे उससे असंहत देखा जाता |
छा० उ० ३०—