भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 940

९३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

| एकशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तत्फलं प्राप्तं देवैरित्यभिप्रायः ।<br><br>तद्युक्तं देवानां महाभाग्यत्वान्न त्विदानीं मनुष्याणामल्पजीवितत्वान्मन्दतरप्रज्ञत्वाच्च सम्भवतीति प्राप्त इदमुच्यते—स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानिदानींतनोऽपि; कोऽसौ ? इन्द्रादिवद्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह सामान्येन किल प्रजापतिरुवाच । अतः सर्वेषामात्मज्ञानं तत्फलप्राप्तिश्च तुल्यैव भवतीत्यर्थः । द्विर्वचनं प्रकरणसमाप्त्यर्थम् ॥ ६ ॥ | है कि जिसके लिये इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया था वह फल देवताओंको प्राप्त हो गया ।<br><br>देवता महान् भाग्यशाली हैं, अतः उनके लिये वह (सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंकी प्राप्ति होनी ) उचित ही है, किंतु इस समय मनुष्योंको तो उनका मिलना सम्भव नहीं हैं; क्योंकि वे अल्पजीवी और मन्दतर बुद्धिवाले हैं—ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है—वह वर्तमानकालीन साधक भी सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है । वह कौन ? जो इन्द्रादिके समान उस आत्माको जानकर साक्षात् अनुभव कर लेता है—इस प्रकार सामान्यरूपसे ( सभीके लिये ) प्रजापतिने कहा । अतः आत्मज्ञान और उसके फलकी प्राप्ति सभीके लिये समान है—ऐसा इसका तात्पर्य है । 'प्रजापतिरुवाच' इसकी द्विरुक्ति प्रकरणकी समाप्तिके लिये है ॥ ६ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषद्व्यष्टमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

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