चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें८० चरकसंहिता [ अ० ५ उबटन लगाना— दौर्गन्ध्यं गौरवं तन्द्रां कण्डूं मलमरोचकम् ॥ ६१ ॥ स्वेदं बीभत्सतां हन्ति शरीर-परिमार्जनम् । शरीर पर उबटन ( बेसन आदि ) मलने से शरीर की दुर्गन्ध, भारीपन, तन्द्रा ( काम में आलस्य ), खाज, मल, अरुचि ( भोजन में अनिच्छा ), स्वेद, बीभत्सता ( पसीने की बदबू ) नष्ट हो जाते हैं ॥ ६१ ॥ स्नान का फल— पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रम-स्वेद-मलापहम् ॥ ६२ ॥ शरीर-बल-संधानं स्नानमोजस्करं परम् । नित्य प्रति स्नान करने से मनुष्य को पवित्रता, वृष्यता (पुरुषत्व), दीर्घायु मिलती है । स्नान से थकावट, पसीना और मल की दुर्गन्ध दूर हो जाती है । स्नान करने से शरीर का बल और ओज ( तेज, कान्ति, दीप्ति ) विशेष रूप में बढ़ता है ॥ ६२ ॥ ('ओज' आठवीं धातु है । 'मज्जा' के सूक्ष्म भाग का शुक्राग्नि से पाक होने पर जो सूक्ष्मतम भाग बनता है, वही 'ओज' है । द्रव्यों का अन्तःस्राव ( Internal secretion ) का नाम 'ओज' है, जिसके कम होने से मनुष्य का तेज कम हो जाता है और जिसके नाश होने पर मनुष्य भी मर जाता है ।) स्वच्छ वस्त्र पहिनने के गुण— [L20: काम्यं यशस्यमायुष्यमलक्ष्मीघ्नं प्रहर्षणम् ॥ ६३ ॥ श्रीमत्पारिषदं शस्तं निर्मलाम्बर-धारणम् । निर्मल, स्वच्छ साफ वस्त्र पहिनने से मनुष्य को कमनीयता, सुन्दरता, यश, कीर्त्ति, दीर्घायु मिलती है । स्वच्छ वस्त्र अलक्ष्मीघ्न अर्थात् दरिद्रता को दूर करता है और प्रहर्षण अर्थात् ( चित्त को खुश करता है ) । स्वच्छ वस्त्र राजाओं की सभा में भी प्रशंसित होता है ॥ ६३ ॥ गन्धमाला आदि के धारण करने के गुण— वृष्यं सौगन्ध्यमायुष्यं काम्यं पुष्टिबलप्रदम् ॥ ६४ ॥ सौमनस्यमलक्ष्मीघ्नं गन्ध-माल्य-निषेवणम् । सुगन्धित पदार्थ, इत्र आदि और पुष्प माला आदि को धारण करने से मनुष्य को पुरुषत्व, सुगन्धि, दीर्घायु मिलती है । इनके धारण करने से शरीर में कमनीयता, पुष्टि और बल आता है । माला के धारण करने से मन प्रसन्न रहता है और दरिद्रता का नाश होता है ॥ ६४ ॥