भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

६० चरकसंहिता [ अ० ६ व्यायाम उबटन, धूमपान, कवल (गरारे करना) और अञ्जन लगाना चाहिये । स्नान एवं शौच कार्य में गरम पानी का व्यवहार करना चाहिये (पीनेमें नहीं)। शरीर पर चन्दन और अगर का लेप करना चाहिये, जौ और गेहूँ, शरभ बारहसींगे, खरगोश, हरिण, बटेर, कपिञ्जल (कट फोड़ा) इनका मांस खाना चाहिये । कफ दोष नाशक सीधु या अंगूरों का बना शराब पीना चाहिये । वसन्त काल में युवती स्त्रियों और जङ्गलों में मनोरंजन करे ॥ २२-२६ ॥ ग्रीष्मचर्या- मयूखैर्जगतः सारं ग्रीष्मे पेपीयते रविः । स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम् ॥ २७ ॥ शीतं सशर्करं १मन्थं जाङ्गलाम्मृगपक्षिणः । घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् ग्रीष्मे न सीदति ॥ २८ ॥ मद्यमल्पं न वा पेयमथवा सुबहुदकम् । लवणाम्ल-कटूष्णानि व्यायामं चात्र वर्जयेत् ॥ २९ ॥ दिवा शीतगृहे निद्रां निशि चन्द्रांशुशीतले । भजेच्चन्दन-दिग्धाङ्गः प्रवातं हर्म्यमस्तके ॥ ३० ॥ व्यजनैः पाणिसंस्पर्शैश्चन्दनाेदक-शीतलैः । सेव्यमानो भजेदास्यां मुक्तामणि-विभूषितः ॥ ३१ ॥ काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च । ग्रीष्मकाले निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः ॥ ३२ ॥ ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है । इसलिये इस समय मीठा, ठण्डा द्रव पदार्थ पीना, चिकने (घी आदि) खान पान हितकारी हैं। ठण्ड और शर्करा मिश्रित सत्तू खाने से, जंगली पशु- पक्षियों का मांस खाने से, घी और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु में कष्ट नहीं होता । इस ऋतु में मद्य नहीं पीना चाहिये और यदि पीना ही हो तो बहुत पानी मिलाकर पीना चाहिये । नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिये । दिन के समय ठण्डे मकानों में सोना चाहिये और रात में चन्द्रमा की किरणों से ठण्डी की हुई मकान की छत पर खुली वायु में शरीर पर चन्दन मलकर सोना चाहिये । चन्दन और पानी से ठण्डे किये हुए पङ्खों से या हाथ के स्पर्श से, मोती और १ मन्थ—सक्तवः सर्पिषा युक्ताः शीत-वारि-परिप्लुताः । नात्यच्छा नातिसान्द्राश्च मन्थ इत्यभिधीयते ॥