चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ चरकसंहिता [ अ० ७ वेग-निग्रहजा रोगा य एते परिकीर्त्तिताः। इच्छंस्तेषामनुत्पत्तिं वेगानेतान्न धारयेत् ॥ २५ ॥ उपस्थित वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले जो ये रोग कहे हैं, रोगों की उत्पत्ति को न चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह इन वेगों को न रोका करे ॥ २५ ॥ इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च । साहसानामशस्तानां मनो-वाक्काय-कर्मणाम् ॥ २६ ॥ लोभ-शोक-भय-क्रोध-मान-वेगान् विधारयेत् । नैर्लज्ज्येष्र्यातिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान् ॥ २७ ॥ परुषस्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च । वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद्वेगमुत्थितम् ॥ २८ ॥ देहप्रवृत्तिर्या काचिद्वर्तते परपीड़या । स्त्रीभोगस्तेय-हिंसाद्या तस्या वेगान्विधारयेत् ॥ २९ ॥ पुण्यशब्दो विपापत्वान्मनो-वाक्काय-कर्मणाम् । धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुङ्क्ते चिनोति च ॥ ३० ॥ इहलोक और परलोक की हित कामना करने वाले मनुष्य को चाहिये कि इन आगे कहे वेगों को धारण करे, जैसे—अयोग्य अनुचित साहस और मन वाणी और शरीर के निन्दित कर्मों के उपस्थित वेगों को रोके । मन के निन्दित कार्य जैसे—लोभ, अनुचित विषय में मन की प्रवृत्ति, ( शोक ) धन बान्धव आदि के कारण दुःख में मन की प्रवृत्ति, भय, क्रोध जिसके कारण मनुष्य अपने को जलता हुआ प्रतीत करता है, ( द्वेष ) वैर, दूसरे के अपकार करने में मन की प्रवृत्ति, ( मान ) महत्व, अभिमान में मन की प्रवृत्ति, ( जुगुप्सित ) दूसरे की निन्दा, ( निर्लज्जा ) लज्जा का अभाव, ( ईर्ष्या ) कुढ़ना, ( अभिध्या ) दूसरे के द्रव्य को लेने की लालसा-बुद्धि, इन मन के निन्दित कार्यों को रोकना चाहिये। वाणी के निन्दित कर्म—कर्कश, कठोर विशेषतः दूसरे की निन्दा या अनिष्ट करने की इच्छा से झूठी और अप्रासंगिक वाणी को रोकना चाहिये। शरीर के निन्दित कर्म—दूसरे को दुःख देने की जो कोई शरीर की चेष्टा हो, उसे स्त्री-भोग ( पर-स्त्रीसम्भोग ), स्तेय ( चोरी ), हिंसा ( दुःख कष्ट देना., मारना ) आदि शरीर कार्यों के उपस्थित वेगों को रोकना चाहिये। अपनी आत्मा के प्रतिकूल जो कार्य हों वे कार्य दूसरे के लिये न