भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ७ ] ७ सूत्रस्थानम् ८७ जम्भाई के रोकने से शरीर का झुकना, आक्षेप अर्थात् हाथ-पाँव का जोर से कम्पन, पर्वसन्धियों का आकुञ्चन, अङ्गों का सो जाना, ( स्पर्श ज्ञान का अभाव ), काँपना-हिलना आदि होता है। चिकित्सा के लिये वातनाशक उप- चार करना चाहिये ॥ १६ ॥ कार्श्य-दौर्बल्य-वैवर्ण्यमङ्गमर्दोऽरुचिर्भ्रमः । क्षुद्वेग-निग्रहात्तत्र स्निग्धमुष्णं लघु भोजनम् ॥ २० ॥ भूख रोकने से कृशता, दुर्बलता, रंग का बदल जाना, अङ्ग-प्रत्यङ्गों में वेदना, उनका टूटते हुए प्रतीत होना, भोजन में अनिच्छा, चक्कर आना ये लक्षण होते हैं। चिकित्सा—स्निग्ध ( चिकना ), गरम और हल्का भोजन देना चाहिये ॥ २० ॥ कण्ठास्य-शोषो बाधिर्यं श्रमः श्वासो हृदि व्यथा । पिपासा-निग्रहात्तत्र शीतं तर्पणमिष्यते ॥ २१ ॥ प्यास के रोकने से गले और मुख का खुश्क हो जाना, बहरापन, थकान, श्वास, दम का चढ़ना, हृदय प्रदेश में दर्द ये लक्षण होते हैं। चिकित्सा— शीतल, तृप्ति करनेवाले खान-पान देने चाहिये ॥ २१ ॥ प्रतिश्यायोऽक्षिरोगश्च हृद्रोगश्चारुचिर्भ्रमः । बाष्प-निग्रहात्तत्र स्वप्नो मद्यं प्रियाः कथाः ॥ २२ ॥ आँसुओं के रोकने से नाक से पानी झरना, कफ का स्राव होना, आँखों के रोग, हृदय रोग, अनिच्छा और भ्रम, (सिरमें चक्कर) आदि होते हैं। चिकित्सा— नींद, मदिरा का पान, आनन्ददायक प्रिय बातचीत करना चाहिये ॥ २२ ॥ जृम्भाऽङ्गमर्दस्तन्द्रा च शिरो-रोगाक्षि-गौरवम् । निद्रा-विधारणात्तत्र स्वप्नः संवाहनानि च ॥ २३ ॥ नींद रोकने से जम्भाई, अङ्गों का टूटना ( शरीर में भारीपन ), शिर की वेदना और आँखें भारी हो जाती हैं। चिकित्सा—नींद लाना, अङ्गों का संवा- हन अर्थात् हाथों से अङ्गों का दबाना कल्याणकारी है ॥ २३ ॥ गुल्म-हृद्रोग-संमोहाः श्रम-निश्वास-धारणात् । जायन्ते, तत्र विश्रामो वातघ्नाश्च क्रिया हिताः ॥ २४ ॥ थकान से उत्पन्न निःश्वास को रोकने से गुल्म रोग, हृद्-रोग, ( मूर्च्छा ) उत्पन्न होती है। इस के लिये विश्राम, ( आराम ) एवं वातनाशक उपचार करने चाहियें ॥२४॥