चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ चरकसंहिता [ अ० ७ अफरा हो जाता है थकान की अंगों में प्रतीति होना, पेट में पीड़ा और अन्य वातजन्य रोग भी हो जाते हैं ॥ १२ ॥ चिकित्सा— स्नेह-स्वेद-विधिस्तत्र वर्तयो भोजनानि च । पानानि बस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम् ॥१३॥ स्नेह (तैल) एवं स्वेद देना चाहिये, फलवर्त्तियाँ, वातनाशक खान-पान और वातनाशक बस्तिकर्म उत्तम हैं ॥ १३ ॥ कण्डू-कोठ-रुचि-व्यङ्ग-शोथ-पाण्ड्वामय-ज्वराः । कुष्ठ-हृल्लास-वीसर्पच्छर्दि-निग्रहजा गदाः ॥ १४ ॥ वमन के रोकने से खाज, कोठ, भोजन में अनिच्छा, झांई, मुखपर काले- काले दाग आना, सूजन, पाण्डु रोग, ज्वर, कोढ़, हृल्लास (वमन की रुचि), जी मिचलाना, वीसर्प ये रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥ चिकित्सा— भुक्त्वा प्रच्छर्दनं धूमो लङ्घनं रक्तमोक्षणम् । रूक्षान्नपानं व्यायामो विरेकश्चात्र शस्यते ॥ १५ ॥ भोजन खिलाकर वमन कराना चाहिये, धूम्रपान, उपवास, शिराव्यधन करके रक्त का निकालना, रूखे अन्न और पान, व्यायाम और विरेचन ये उपाय उत्तम हैं ॥ १५ ॥ मन्यास्तम्भः शिरःशूलमर्दिताधार्धावभेदकौ । इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथोः स्याद्विधारणात् ॥ १६ ॥ छींक के रोकने से ग्रीवा का जकड़ जाना, शिरोवेदना, चेहरे का लकवा, आधा सीसी, आँख आदि इन्द्रियों की निर्बलता हो जाती है ॥ १६ ॥ तत्रोर्ध्वजत्रुकेऽभ्यङ्गः स्वेदो धूमः सनावनः । हितं वातघ्नमान्नं च घृतं चोत्तरभक्तिकम् ॥ १७ ॥ चिकित्सा—ग्रीवा से ऊपर के भागों में मालिश, पसीना देना, धूम्रपान नस्य, वातनाशक भोजन और खाना खानेके पीछे घृतपान करना हितकारी है ॥ हिक्का श्वासोऽरुचिः कम्पो विबन्धो हृदयोरसोः । उद्गार-निग्रहात्तत्र हिक्कायास्तुल्यमौषधम् ॥ १८ ॥ डकार को रोकने पर हिचकी का आना, श्वास, भोजन में अनिच्छा, सिर- छाती का काँपना, छाती और हृदय का रुक जाना ये रोग हो जाते हैं। चिकित्सा—डकार के रोकने से उत्पन्न विकार की शान्ति के लिये हिचकी के समान औषध करनी चाहिये ॥ १८ ॥ विनामाक्षेपसङ्कोचाः सुप्तिः कम्पः प्रवेपनम् । जृम्भाया निग्रहात्तत्र सर्वं वातघ्नमौषधम् ॥ १६ ॥