भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १३१ बातें पूर्व कह दी गई हैं आगे विस्तार से भी कहेंगे । उनका ठीक २ प्रकार से पालन करने से मनुष्य प्राणों की रक्षा कर के दीर्घायु प्राप्त करता है । इस प्रकार से प्रथमौषणा का उपदेश कर दिया ॥ ४ ॥ अथ द्वितीयां धनैषणामानद्येत, प्राणेभ्यो ह्यनन्तरं धनमेव पर्येष्टव्यं भवति, न ह्यतः पापात्पापीयोऽस्ति यदनुपकरणस्य दीर्घमायुः, तस्मादु- पकरणानि पर्येष्टुं यतेत । तत्रोपकरणोपायाननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा कृषि-पाशुपाल्य-वाणिज्य-राजोपसेवाद्दीनि, यानि चान्यान्यपि सतामवि- गर्हितानि कर्माणि वृत्ति-पुष्टि-कराणि विद्यात्तान्यरभेत कर्तुम्, तथा कुर्वन् दीर्घजीवितं जीवत्यनवमतः पुरुषो भवतीति द्वितीया धनैषणा व्याख्याता भवति ॥ ५ ॥ अब दूसरी 'धनैषणा' को भी करें । प्राणों से उतर कर धन ही आवश्यक होता है । क्योंकि इससे बढ़कर और कोई पाप संसार में नहीं है बिना साधनों के दीर्घ जीवन व्यतीत करना, इसलिये उपकरणों अर्थात् धन कमाने के साधनों को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिये । धन कमाने के साधनों का भी उपदेश करते हैं, जैसे खेती, पशुओं का पालन, वाणिज्य-व्यापार, राजा की सेवा आदि । इनके सिवाय अन्य और भी जो २ कार्य सज्जन पुरुषों से अनिन्दित, जीविका को देने वाले हों, उन को करे इस प्रकार करने से दीर्घायु प्राप्त करता है और तिरस्काररहित जीवन व्यतीत करता है । इस प्रकार से दूसरी 'धनैषणा' की भी व्याख्या करदी । ५ ॥ अथ तृतीयां परलोकैषणामानद्येत । संशयश्चात्र—कथं ? भवि- ष्याम इतश्च्युता न वेति । कुतः संशयः पुनः इति ? उच्यते-सन्ति ह्येके प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्यमाश्रिताः । सन्ति चापरे ये त्वागमप्रत्ययादेव पुनर्भवमिच्छन्ति । श्रुतिभेदाच्च ।- 'मातरं पितरं चैकं मन्यन्ते जन्मकारणम् । स्वभावं परनिर्माणं यदृच्छां चापरे जनाः ॥' इत्यतः संशयः-किं नु खल्वस्ति पुनर्भवो न वेति ॥ ६ ॥ अब तीसरी 'परलोकैषणा' को भी प्राप्त करे । इस 'परलोकैषणा' के विषय में सन्देह है कि यहां से मरने के पीछे फिर जन्म होगा वा नहीं । संशय क्यों है ? कहते हैं-कुछ मनुष्य ऐसे हैं, जो कि प्रत्यक्ष से जानने योग्य वस्तु को [मान]ते हैं और परोक्ष को नहीं मानते । परोक्ष आंख से दिखाई नहीं देता, [इसलिये] ये नास्तिक मत को स्वीकार करते हैं, पुनर्जन्म को नहीं मानते । [किन्तु दूसरे] वेदोपदेश को प्रमाण मानकर ही पुनर्जन्म को मानते हैं । श्रुति की