भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158

६४० चरकसंहित! [ अ० ११

धिक्य रहता है । बलकारक आहार या चेष्टा विहार से जो बल उत्पन्न किया जाता है वह युक्तिकृत है ॥ ३५ ॥ त्रीण्यायतनानीति अर्थानां कर्मणः कालस्य चातियोगायोग-मिथ्या- योगाः । तत्रातिप्रभावाणां दृश्यानामतिमात्रं दर्शनमतियोगः, सर्वशोऽ- दर्शनमयोगः, अतिसूक्ष्मातिश्लिष्टानिविप्रकृष्ट-रौद्र-भैरवाद्भुत द्विष-बीभ- त्स-विकृतादि-रूप-दर्शनं मिथ्यायोगः । तथाऽतिमात्र-स्तनित-पटहोत्कृ- ष्टादीनां शब्दानामतिमात्रं श्रवणमतियोगः, सर्वशोऽश्रवणमयोगः, परुषे- ष्ट-विनाशापघात-प्रधर्षण भीषणादि-शब्द-श्रवणं मिथ्यायोगः । तथाऽ- तितीक्ष्णोग्राभिष्यन्दिनां गन्धानामतिमात्रं घ्राणमतियोगः, सर्वशोऽघ्रा- णमयोगः। पूति-द्विष्टामेध्य-क्लिन्न-विष-पवन-कुणप-गन्धादि घ्राणं मिथ्या- योगः, तथा रसानामत्यादानमतियोगः, अनादानमयोगः, मिथ्यायोगो राशि-वर्ज्येष्वाहार-विधि-विशेषायतनेषूपदेक्ष्यते; तथाऽतिशीतोष्णानां स्पृश्यानां स्नानाभ्यङ्गोत्साधनादीनां चात्युपसेवनमतियोगः, सर्वशोऽनुप- सेवनमयोगः,स्नानादीनां शीतोष्णादीनां च स्पृश्यानामानुपूर्व्योपसेवनं विषम-स्थानाभिघाताशुचि-भूत-संसर्गादियश्चेति मिथ्यायोगः ॥ ३६ ॥ रोग के आयतन अर्थात् कारण तीन हैं, अर्थ, अर्थात् इन्द्रियों के विषय कर्म और काल इन तीनों का अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग ये तीन रोगों के 'आयतन' हैं । बहुत चमकने वाले पदार्थ सूर्य आदि का देर तक देखना चक्षु-इन्द्रिय का 'अतियोग' है, सर्वथा ही न देखना 'अयोग' है । बहुत क्लेशदायक पदार्थ का देखना, बहुत दूर की वस्तु को देखना, रौद्र, भयानक- डरावनी, अद्भुत, अप्रिय, बीभत्स और विकृत रूपों को देखना, आंख का 'मिथ्यायोग' है । इसी प्रकार बादल की घरघराहट को अधिक सुनना, ढोल या नगाड़े की आवाज़ को बहुत सुनना, तार आदि के बहुत ऊँचे शब्द को अधिक सुनना, कान का 'अतियोग' है । सर्वथा न सुनना 'अयोग' है । कठोर, पुत्र धन आदि इष्ट वस्तुओं के नाश को सुनना, इष्ट वस्तु के मरण को सुनना, दुर्व- चन, तिरस्कार सुनना, भयोत्पादक भयानक शब्दों का सुनना, श्रोत्रेन्द्रिय का 'मिथ्यायोग' है । अति तीव्र ( मरिच आदि ) गन्ध का सूंघना, उग्र, चमेली आदि गन्ध का अधिक सूंघना, माल कंगनी आदि गन्ध का अधिक मात्रा में सूंघना, नासा का 'अतियोग' है । सर्वथा न सूंघना नाक का 'अयोग' है, सड़ी दुर्गन्धयुक्त, गली की अपवित्र जहरीली वायु, मुर्दे की गन्ध जैसी वस्तुओं का सूंघना नाक का 'मिथ्यायोग' है । इसी प्रकार मधुर आदि रसों का अधिक