भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 639 में से

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१४२ चरकसंहिता [अ० ११ नादिर्वाङ्मिथ्यायोगः। भय-शोक-क्रोध-लोभ-मोह-मानेर्ष्या-मिथ्यादर्श- नादिर्मानसो मिथ्यायोगः॥ ३८॥ वाणी मन और शरीर इन की चेष्टा का नाम ‘कर्म' है, इन में वाणी, मन और शरीर की अतिप्रवृत्ति का नाम 'अतियोग' है। इन की सर्वथा प्रवृत्ति न होना 'अयोग' है। वाणी, मल-मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना, अनुपस्थित वेगों को बलपूर्वक बाहर निकालना, सम स्थान पर विषम (टेढ़ा-मेढ़ा) गिरना, अनुचित रूप से चलना, ऊंचे स्थान से कूदना, अंगों को टेढ़ा-मेढ़ा करना, अंगों को पीड़ित करना, खुजाना, दबाना आदि, अङ्गों पर दण्ड आदि से प्रहार करना, अङ्गों को मर्दन करना, श्वास घोटना, श्वास बन्द करना, संक्लेश व्रत, उपवास आदि, विषम नृत्य आदि कर्म भी शरीर के 'मिथ्यायोग' हैं। निन्दा, चुगली, मिथ्या बोलना, बिना समय के बात करना, झगड़ा करना, जी को दुःखाने वाला अप्रिय, असम्बद्ध, प्रतिकूल और कर्कश बोलना, वाणी का 'मिथ्यायोग' है। भय, शोक, चिन्ता, क्रोध, लोभ, मोह, अज्ञान, मान, अहंकार, ईर्ष्या, मिथ्यादर्शन, नास्तिक्य बुद्धि ये मन के 'मिथ्यायोग' हैं॥ ३८॥ संग्रहेण चातियोगायोगवर्जं कर्म वाङ्-मनः-शरीरजमहितमनुप- दिष्टं यत् तच्च मिथ्यायोगं विद्यात् ॥ ३६ ॥ इति त्रिविध-विकल्पं त्रिवि- धमेव कर्म प्रज्ञापराध इति व्यवस्येत् ॥ ४० ॥ संक्षेप में—वाणी, मन और शरीर के जो अहितकारी और नहीं कहे हुए कर्म हैं, जिनका अतियोग या अयोग में समावेश नहीं होता, वे सब 'मिथ्या- योग' जानने चाहियें। वाणी, मन और शरीर इनके अतियोग अयोग और मिथ्या- योग को 'प्रज्ञापराध' कहते हैं॥ ३६-४०॥ शीतोष्ण-वर्ष-लक्षणाः पुनर्हेमन्त-ग्रीष्म-वर्षाः संवत्सरः स कालः । तत्रातिमात्र-स्वलक्षणः कालः कालातियोगः, हीन-स्वलक्षणः कालः काला- योगः, यथास्वलक्षण-विपरीतलक्षणस्तु कालः कालमिथ्यायोगः। कालः पुनः परिणाम उच्यते ॥ ४१ ॥ हेमन्त और शिशिर शीत काल, वसन्त और ग्रीष्म उष्ण काल, वर्षा और शरद् और वर्षा काल। इस प्रकार से हेमन्त, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और शरद् इन छः ऋतुओं वाला सम्वत्सर रूप काल, शीत, उष्ण और वर्षा के रूप में तीन प्रकार का है। इन में अपने लक्षणों से अधिक हेमन्त आदि का होना काल का 'अतियोग' है, शीतकाल में बहुत अधिक शीत, ग्रीष्म में बहुत अधिक गरमी, वर्षा काल में बहुत अधिक बरसात पड़ना ये काल के 'अतियोग' हैं।

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