भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १४६ वाली कौन सी वस्तुएं हैं ? और किस प्रकार से इस अमूर्त्त, अदृश्य एवं निरन्तर गतिशील, चंचलस्वभाव वायु को बिना प्राप्त किये कुपित करने वाली वस्तुएं इसे कैसे कुपित करती हैं, अथवा शान्त करने वाली वस्तुएं किस प्रकार से इस को शान्त करती हैं ? और शरीर के अन्दर गति करने वाले एवं लोक में चलने वाले, कुपित एवं अकुपित वायु के शरीर के अन्दर गति करते हुए कौन २ से कर्म हैं, और शरीर के बाहर लोक में गति करते हुए इस के कौन से कर्म होते हैं ? ॥ ३ ॥ अत्रोवाच कुशः साङ्कृत्यायनः-रूक्ष-लघु-शीत-दारुण-खर-विशदाः षडिमे वातगुणा भवन्ति ॥ ४ ॥ इस प्रसङ्ग में ऋषि साङ्कृत्यायन कुश बोले—वायु के रूक्ष, लघु, शीत, दारुण, खर, विशद ये छः गुण होते हैं ॥४॥ तच्छ्रुत्वा वाक्यं कुमारशिरा भरद्वाज उवाच—एवमेतद्यथा भग- वानाह, एत एव वातगुणा भवन्ति, स त्वेवंगुणैर्द्रव्यैरेवंप्रभावैश्च कर्मभिरभ्यस्यमानैर्वायुः प्रकोपमापद्यते, समानगुणाभ्यासो हि धातूनां वृद्धिकारणमिति ॥ ५ ॥ इस को सुनकर ऋषि कुमारशिरा भरद्वाज बोले—“जिस प्रकार आपने कहा, ठीक इसी प्रकार है । ये रूक्ष आदि छः गुण ही वायु के हैं, इसलिये इन गुणों वाले पदार्थों इन गुण वाले प्रभावों और इन गुण वाले कर्मों के पुनः २ सेवन करने से वायु का प्रकोप होता है । क्योंकि धातुओं के समान गुण वाले पदार्थों वा कर्मों के पुनः २ सेवन करने से धातुओं की वृद्धि होती है” ॥५॥ तच्छ्रुत्वा वाक्यं काङ्कायनो बाह्लीकभिषगुवाच—एवमेतद्यथा भगवानाह, एतान्येव वातप्रकोपनानि भवन्ति, अतो विपरीतानि खल्वस्य प्रशमनानि भवन्ति, प्रकोपनविपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारण- मिति ॥ ६॥ इस बात को सुनकर काङ्कायन नाम बाह्लीक (बलख़) देश के वैद्य बोले— ‘जिस प्रकार आपने कहा ठीक ऐसा ही है । ये ही कारण वात को कुपित करते हैं । इनके विपरीत स्निग्ध, गुरु, उष्ण, मृदु, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, स्थूल, स्थिर, गुण वाले द्रव्य या इस प्रकार के कर्म इस कुपित वायु को प्रशमन करते हैं । क्योंकि कोपक वस्तुओं के कारणों के विपरीत गुण वाले द्रव्य धातुओं को शान्त करते हैं’ ॥ ६ ॥ तच्छ्रुत्वा वाक्यं बडिशो धामार्गव उवाच—एवमेतद्यथा भगवा-

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