भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

अ० १२ ] सूत्रस्थानम् १५१ पादयत्यतिकालं धारयति, भय-शोक-मोह-दैन्यातिप्रलापाञ्जनयति, प्राणांश्चोपरुणद्धि । प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा- धरणीधारणं, ज्वलनोज्ज्वलनं, आदित्य-चन्द्र-नक्षत्र-ग्रह गणानां सन्तान- गति-विधानं सृष्टिश्च मेघानां, अपां च विसर्गः, प्रवर्त्तनं स्रोतसां, पुष्पफलानां चाभिनिर्वर्त्तनम्, उद्भेदनं चौद्भिदानां, ऋतूनां प्रविभागः, विभागो धातूनां धातुमानसंस्थानव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः, शस्या- भिवर्धनमविक्लदोपशोषणेऽवैकारिक-विकाराइचेति । प्रकुपितस्य खल्वस्य लोकेषु चरतः कर्माणीमानि भवन्ति, तद्यथा- उत्त्रोडनं सागराणां, उद्वर्त्तनं सरसां, प्रतिसरणमापगानाम्, आकम्पनं च भूमेः, आधमनमम्बुदानां, शिखरिशिखरावमथनं, उन्मथनमाकहानां, नीहार-निर्ह्राद-पांसु-सिकता-मत्स्य-भेकारग क्षार रुधिराश्माशनि-विसर्गः व्यापादनं च षण्णामृतूनां, शस्यानामसंघातः, भूतानां चापसर्गः, भावानां चाभावकरणं, चतुर्युगान्तकरणां मेघ-सूर्यानलानिलानां विसर्गः । स हि भगवान् प्रभवश्चाव्ययश्च, भूतानां भावाभावकरः, सुखा- सुखयोर्विधाता, मृत्युः, यमो, नियन्ता, प्रजापतिः, अदितिः, विश्वकर्मा, विश्वरूपः, सर्वगः, सर्वतन्त्राणां विधाता, भावानामणुर्विभुर्विष्णुः, क्रान्ता लोकानां, वायुरेव भगवानिति ॥८॥ बडिश के सत्य एवं ऋषियों के अनुमोदित उस बचन को सुन कर राजर्षि वार्योविद ने कहा-आपने जो कुछ कहा है वह सब ठीक ही है, अर्थात् इन नियमों के प्रतिकूल एक भी उदाहरण नहीं है । "अपवाद"का अर्थ निन्दा भी होता है । अभिप्राय यह है कि सब ऋषियों का इस विषय में एक ही मत है । कुपित तथा शान्त हुये शरीर में संचार करने वाले एवं शरीर से बाहर संचार करने वाले वायु के शरीर में तथा शरीर से बाहर जो कर्म हैं उनके अवयवों को प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध कर तथा वायु को नमस्कार कर यथाशक्ति कहूँगा । वायु शरीररूपी यन्त्रों को धारण करने वाला है । 'तन्त्र' शब्द से शरीरस्थ धातुओं के जो अपने-अपने नियम हैं उनसे अभिप्राय है । यन्त्र से अभिप्राय जिसके द्वारा शरीरस्थ धातुओं का एक जगह से दूसरी जगह जाना आदि व्यापार होता है । अर्थात् तन्त्र (नियम) एवं यन्त्र दोनों को धारण करनेवाला है। वायु प्राणादि पांच रूपों वाला है। सम्पूर्ण उच्च या नीच विविध प्रकार की चेष्टाओं का प्रवर्त्तक है, मनका नियामक तथा नेता (लेजाने बाला) है ( वायु