चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५२ चरकसंहिता [ अ० १२ मनको अनिष्ट विषय से लौटा कर इष्ट विषय में लगाता है) यही वायु सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों में प्रेरणा करता है। सम्पूर्ण शब्द आदि इन्द्रियों के विषयों का वहन करने वाला भी वायु ही है। वायु ही शरीरस्थ धातुओं को यथानियम अपने २ स्थलों पर स्थापित करता है। शरीर को जोड़ने वाला भी यही वायु है, वाणी को प्रवृत्त करने वाला, स्पर्श तथा शब्द की प्रकृति (कारण) श्रोत्रेन्द्रिय एवं स्पर्शनेन्द्रिय का मूल कारण वायु ही है। यह वायु हर्ष तथा उत्साह की योनि है (अभिव्यक्ति का कारण है। अग्नि का प्रेरक शरीरस्थ दोषों का शोषण करनेवाला। मलों को बाहर निकालने वाला, स्थूल एवं सूक्ष्म स्रोतों को भेदन करने वाला, शरीरोत्पत्ति के समय गर्भ की आकृ- तियों को बनाने वाला भी वायु ही है। यह वायु आयु के अनुवर्तन-परिपालन का कारणभूत होता है। उपर्युक्त सभी कर्म शान्तवायु के कहे गये हैं। शरीर में कुपित हुआ वायु तो शरीर को नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित करता है, जिस से बलवर्णादि क्षीण होता है, मनको दुःखित करता है, सम्पूर्ण इन्द्रियों को नष्ट करता है, गर्भ को नाश करता है, अथवा जितने काल तक गर्भ को गर्भाशय में रहना चाहिये उससे अधिक काल तक गर्भाशय में ठहराता है। भय, शोक, मोह, दीनता, अतिप्रलाप इनको उत्पन्न करता है और मृत्यु काभी कारण होता है। प्रकृतिस्थ वायु के लोक में संचरण करने से ये कर्म होते हैं, जैसे—पृथ्वी का धारण करना, अग्नि को जलाना, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहों को बराबर नियमपूर्वक गति में रखना, बादलों को बनाना, जलों का छोड़ना, स्रोतो को बहाना फल-फूलों को उत्पन्न करना, वृक्षादि को पृथ्वी से बाहर निकालना(अंकुरित करना), ऋतुओं का विभाग करना, स्वर्णादि धातुओ का आकार तथा परिमाण को व्यक्त करना, बीजों में अंकुर को उत्पन्न करने की शक्ति पैदा करना, शस्यादि को बढ़ाना, इसे सड़ने तथा सूखने न देना अन्य जो भी प्रकृतिकार्य हैं उसे करना, जब यह वायु प्रकुपित हो कर संसार में संचरण करता है तो इससे ये कर्म होते हैं—समुद्रों को उत्पीड़न करना, तालाब आदि जलाशय के जलों को ऊँचा- करना (अर्थात् तट के बाहर जल को निकालना) नदियों को विपरीत दिशा में बहाना भूकंप कराना, मेघों का गर्जन कराना, पर्वतों के चोटियों को तोड़ना, वृक्षों को उखाड़ना, नीहार,गर्जन,धूलि.बालू,मछली,मेढ़क,सांप,क्षार (राख),रुधिर,छोटे२ पत्थर तथा बिजली को आकाश से गिराना, छहों ऋतुओं को नाश करना, अन्नको उत्पन्न न होने देना, प्राणियों को मारना, उत्पन्न हुये वस्तुओं का नाश