भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १२ । सूत्रस्थानम् १५३ करना,चारो युगोका संहार करनेवाले बादल,सूर्य,अग्नि एवं वायु की सृष्टि करना इत्यादि होते हैं । वह भगवान् वायु उत्पत्ति के कारण हैं, अविनाशी हैं, एवं प्राणियों का उत्पादक तथा नाशक हैं । सुख एवं दुःख को देने वाला, मृत्यु, यम, नियन्ता, प्रजापति, अदिति, विश्वकमो, विश्वरूप सर्वग (व्यापक), सम्पूर्ण नियमों, कर्मों तथा शरीरों को बनाने वाला सभी वस्तुओं का विधाता, सूक्ष्म, व्यापक, विष्णु पृथ्व्यादिलोकों को आक्रमण करने वाला भगवान् वायु ही हैं ॥ ८ ॥ तच्छ्रुत्वा वार्योविद्वचो मरीचिरुवाच-यद्यप्येवमेतत्किमर्थ- स्यास्य वचने विज्ञाने वा सामर्थ्यमस्ति भिषग्विद्यायां, भिषग्विद्यां चाधिकृत्यैयं कथा प्रवृत्तेति ॥ ९ ॥ वार्योविदि के वचन को सुनकर भगवान् मरीचि ने कहा, यद्यपि आपने जो कहा है वह ठीक है तथापि आयुर्वेद में इस विषय को कहना या जानना निष्प्रयोजन है यहां तो केवल चिकित्सा सम्बन्धी ही कथा हो रही है ॥ ९ ॥ वार्योविद उवाच — भिषक् पवनमतिबलमतिपरुषमतिशीघ्र- कारिणमात्ययिकं चेन्नानुनिशम्येत्, सहसा प्रकुपितमतिप्रयतः कथमप्रेऽ- भिरक्षितुमभिधास्यति प्रागेवैनमत्त्ययभयादिति । वायोर्यथार्था स्तुति- रपि भवत्यारोग्याय बलवर्णवृद्धये वर्चस्वित्वायोपचयाय ज्ञानोपपत्तये परमायुःप्रकर्षाय चेति ॥ १० ॥ वार्योविद बोले—चिकित्सा-शास्त्र में वायु बहुत बलवान्, बहुत कठोर, अति शीघ्रकारी अतिचपल; अति दुःखदायक है, यदि ऐसा ज्ञात न हो तो, सहसा वायु के कुपित होने पर, वैद्य किस प्रकार से उसको बिना जाने पहिले ही इससे बचने को कहेगा । वायु के विषय में यथार्थ रूप में कहना, जानना, स्तुति करना भी आरोग्यलाभ, बल, कान्ति, तेज, शक्ति को बढ़ाने, ज्ञान वृद्धि करने और दीर्घतम आयु को प्राप्त करने और बढ़ाने के लिये है ॥ १० ॥ मरीचिरुवाच—अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभा- शुभानि करोति, तद्यथा-पक्तिमपक्तिं दर्शनमदर्शनं मात्राममात्रत्वमूष्मणः प्रकृति-विकृति-वर्णं शौर्यं भयं क्रोधं हर्षं मोहं प्रसादमित्येवमादीनि चापराणि द्वन्द्वानीति ॥ ११ ॥ मरीचि बोले—शरीर में स्थित पित्त के अन्दर पहुंची हुई अग्नि ही कुपित और अकुपित अवस्था में शुभ एवं अशुभ कर्मों को (क्रमशः) करती है ।