भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१५४ चरकसंहिता [ अ० १२ यथा—कुपित न होने पर पचन क्रिया को (भ्राजक पित्त ), स्वाभाविक रंग को (रंजक पित्त ), शौर्य, हर्ष, प्रसाद प्रसन्नता को (साधक अग्नि ) उत्पन्न करती है। कुपित होने पर, पाचन क्रिया की जड़ता, मन्द दृष्टि, उष्णता को अयोग्य प्रमाण में, विकृत वर्ण, भय, क्रोध, मूर्च्छा उत्पन्न करता है। इसी प्रकार कुपित और अकुपित अवस्थाओं में पित्त अन्य द्वन्द्वों को भी उत्पन्न करता है ॥ ११ ॥ तच्छ्रुत्वा मरीचिवचः काप्य उवाच-सोम एव शरीरे श्लेष्मान्त- र्गतः शुभाशुभानि करोति, तद्यथा-दार्ढ्यं शैथिल्यमुपचयं कार्श्यमुत्साह- मालस्यं वृषतां क्लीबतां ज्ञानमज्ञानं बुद्धिं मोहमेवमादीनि चापराणि द्वन्द्वानीति ॥ १२ ॥ मरीचि ऋषि के वचन सुनकर काप्य बोले—शरीरस्थ कफ में सोम (जल तत्त्व) पहुंच कर कुपित और अकुपित अवस्था में शुभ एव अशुभ कर्मों को करता है। अकुपित अवस्था मे—शरीर की दृढ़ता वृद्धि, कार्यों में उत्साह, पुरुषत्व, ज्ञान, बुद्धि आदि को उत्पन्न करता है। कुपित होने पर शरीर का ढीलापन, निर्बलता, आलस्य, नपुंसकता, मूढ़ता मूर्च्छा आदि उत्पन्न करता है। इस प्रकार कुपित और अकुपित अवस्था मे दूसरे द्वन्द्वों को भी उत्पन्न करता है ॥१२॥ तच्छ्रुत्वा काप्यवचो भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच-सर्व एव भवन्तः सम्यगाहुरन्यत्रैकान्तिकवचनात्, सब एव खलु वातपित्त- श्लेष्माणः प्रकृतिभूताः पुरुषमव्यापन्नेन्द्रियं बल-वर्ण-सुखोपपन्नमायुषा महतोपपादयन्ति सम्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्थकामा इव निःश्रेयसेन महतोपपादयन्ति पुरुषमिह चामुष्मिंश्च लोके, विकृतास्त्वेवं महता विपर्ययेणोपपादयन्ति ऋतवस्त्रय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो- पघातकाले इति ॥ १३ ॥ काप्य ऋषि के वचनों को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले—आप सबने जो कुछ कहा वह सब ठीक है। परन्तु आपने जो यह कहा कि अकेला वायु या अकेला पित्त अथवा अकेला कफ ही कुपित और अकुपित अवस्था में सब शुभ-अशुभ कर्म करते हैं—यह वचन व्यभिचरित होने से ठीक नहीं है। सब ही वात पित्त कफ (तीनो ) अकुपित अर्थात् स्वास्थ्यावस्था में प्रकृति युक्त, स्वस्थ इन्द्रिययुक्त पुरुष को, बल, वर्ण, सुख और दीर्घायुष्य प्रदान करते हैं। जिस प्रकार कि उचित रूप में सेवन किये हुए धर्म, अर्थ और काम पुरुष को