भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १३ ] ११ सूत्रस्थानम् १६१ जो मनुष्य नित्य प्रति विशेष रूप में स्नेह का व्यवहार करते हैं, भूख और प्यास को न सहन कर सकने वाले, उत्तम बलवान् जठराग्नि वाले, श्रेष्ठ शारीरिक बल वाले, गुल्मरोगी, सर्पविषाक्रान्त रोगी, वीसर्प रोगी, पागल, मूत्रकृच्छ्र रोगी और जिनका मल सूखा रहता है, वे स्नेह की उत्तम मात्रा का पान करें । स्नेह की प्रधान मात्रा के पीने का गुण सुनो—यदि मात्रा को भली प्रकार से प्रयोग किया जाये तो उपरोक्त समस्त रोग मिट जाते हैं। वह शरीर के दोषों को खींच कर बाहर कर देती है, शरीर के सब भागों में ऊपर, नीचे, तिरछे सब जगह फैल जाती है। वह बलवर्द्धक एवं शरीर, इन्द्रिय और चित्त को फिर से हरा भरा बना देती है ॥ ३१-३४ ॥ मध्यम मात्रा— अरुष्का स्फोट-पिडका-कण्डू-पामाभिरर्दिताः । कुष्ठिनश्च प्रमीढाश्च वातशोणितिकाश्च ये ॥ ३५ ॥ नातिबह्वाशिनश्चैव मृदुकोष्ठास्तथैव च । पिबेयुमध्यमां मात्रां मध्यमाश्चापि ये बले ॥ ३६ ॥ मात्रैषा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी । सुखेन च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते ॥ ३७ ॥ गांठें, फोड़े, फुन्सियां, खाज, पामा, कुष्ठरोगी, प्रमेही, अतिमूत्ररोगी, वातरक्तरोगी, अधिक न खाने वाले, न कम खाने वाले, मृदुकोष्ठ वाले, (जिनको दूध से भी विरेचन हो जाता है ), और मध्यम बल वाले व्यक्ति स्नेह की मध्यम मात्रा का पान करें । यह मध्यममात्रा मृदु-विरेचक, थोड़ा कष्ट करने वाली, एवं बल को बहुत नहीं घटाती, सुखपूर्वक सरलता से शरीर को कोमल कर देती है, इसीलिये शरीर को शोधन करने के लिये हितकारी है ॥ ३५-३७ ॥ ह्रस्व मात्रा— ये तु वृद्धाश्च बालाश्च सुकुमाराः सुखोचिताः । रिक्तकोष्ठत्वमहितं येषां मन्दाग्नयश्च ये ॥ ३८ ॥ ज्वरातीसार-कासाश्च येषां चिरसमुत्थिताः । स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते ह्रस्वां ये चावरा बले ॥ ३६ ॥ परिहारे सुखा चैषा मात्रा स्नेहनबृंहणी । वृष्या बल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते ॥ ४० ॥ वृद्ध, बालक, कोमल, नाजुक प्रकृति के, ऐश की जिन्दगी बसर करने