भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६५ चिकना और पतला, अंगों में कोमलता और चिकनापन हो, तो समझना चाहिये कि उचित रूप में स्नेहन हुआ है ॥ ५८ ॥ पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता । तन्द्रीररुचिरुत्क्लेशः स्यादतिस्निग्धलक्षणम् ॥ ५६ ॥ पाण्डुता (पीलापन, निस्तेज वर्ण), शरीर में भारीपन, आलस्य, मल का भली प्रकार पाक न होना, अरुचि, सुस्ती, वमन की इच्छा ये अतिस्निग्ध के लक्षण हैं ॥ ५६ ॥ द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः । नातिस्निग्धमसंकीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता ॥ ६० ॥ पिबेत्संशमनं स्नेहमन्नकाले प्रकाङ्क्षितः । स्नेह से पूर्व लेने योग्य हितकारी पदार्थ—स्नेह पान करने की इच्छावाले व्यक्ति को चाहिये कि स्नेह पाने से पहिले दिन, द्रव, और गरम, जो कफकारक न हो, अतिस्निग्ध, अतिविकार युक्त, असंकीर्ण ऐसे भोजन को मात्रा से खावे, जो दो तीन वस्तुओं को मिलाकर न बनाया गया हो और अगले दिन जब भोजन के समय आकांक्षा हो तब संशमन स्नेह का ही पान करे ॥ ६० ॥ शुद्धयर्थं पुनराहारे नष्टे जीर्णे पिबेन्नरः ॥ ६१ ॥ संशोधन के उद्देश्य से स्नेह पान करने के लिये रात्रि का भोजन जीर्ण होने पर प्रातःकाल स्नेहपान करे ॥ ६१ ॥ उष्णोदकोपचारी स्याद् ब्रह्मचारी क्षपाशयः । शकृन्मूत्रानिलोद्गारानुदीर्णांश्च न धारयेत् ॥ ६२ ॥ व्यायाममुच्चैर्वचनं क्रोध-शोकौ हिमातपौ । वर्जयेदप्रवातं च सेवेत शयनासनम् ॥ ६३ ॥ स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च । स्नेहमिथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुणा गदाः ॥ ६४ ॥ स्नेहनकाल में हित अहित—पीने, स्नान, शौच आदि कार्यों में गरम पानी का व्यवहार करे, मैथुन को छोड़ दे। रात्रि में सोये, दिन में न सोये रात में न जागे, उपस्थित हुए मल, मूत्र, वायु और डकार के वेगों को न रोके । व्यायाम-श्रम, और जोर से या अधिक भाषण, क्रोध, शोक, सरदी या गरमी न सहे । खुली-वायु में वायु के सामने न बैठे और न सोये । स्नेह को पीने के पीछे इन कार्यों का पालन करे । स्नेह पीने के पीछे पुनः स्नेह पान करने पर, स्नेह पीकर, भोजन आदि में दूसरी बार स्नेह युक्त पदार्थ खाने से, स्नेह के मिथ्यायोग से भयानक रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥६२–६४॥