भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

१६८ चरकसंहिता [ अ० १३ तन्द्रा (आलस्य), उत्क्लेश (वमन की इच्छा), आनाह (अफरा) ज्वर, स्तम्भ (शरीर की जड़ता), संज्ञानाश, कुष्ठ, खाज, पाण्डुता, शोथ, अर्श, अरुचि, प्यास, मरोड़ा, ग्रहणी रोग, स्तैमित्य (अंगों का गीले कपड़े में लिपटने का सा भान होना, वा ऐंठन), वाणी का बन्द हो जाना, उदरशूल, आमदोष, स्नेह के मिथ्यायोग के ये लक्षण हैं। इन लक्षणों के होने पर भी वमन कराना चाहिये, स्वेद देना चाहिये, समय की प्रतीक्षा करनी (स्नेह दोष के क्षय होने तक भोजन नहीं करना) चाहिये, प्रत्येक व्याधि का बल विचार करके जो व्याधि संशमन योग्य हो उसका संशमन करना चाहिये। इसी प्रकार 'तक्रारिष्ट' का प्रयोग, रूक्ष (सूखा) खान-पान देना आठों प्रकार के मूत्रों और त्रिफला का सेवन करना स्नेह जन्य रोगों की चिकित्सा है ॥ ७५-७८ ॥ रोग होने के कारण— अकाले चाहितश्चैव मात्रया न च योजितः ॥ ७९ ॥ स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येतातिसेवितः । स्नेह लेने के ठीक समय पर स्नेह न लेने से, जो स्नेह जिस पुरुष के लिये हितकारी नहीं है उसके सेवन से, उचित मात्रा में न लेने से, स्नेह के मिथ्या, अनुचित उपयोग से, और स्नेह के अति सेवन से स्नेह जन्य विकार उत्पन्न होते हैं ॥ ७९ ॥ स्नेहात्प्रस्कन्दनं जन्तुस्त्रिरात्रोपरतः पिबेत् ॥ ८० ॥ स्नेहवद् द्रवमुष्णं च त्र्यहं भुक्त्वा रसौदनम् । एकाहोपरतस्तद्वद्भुक्त्वा प्रच्छर्दनं पिबेत् ॥ ८१ ॥ स्नेह पान के पीछे पुरुष तीन रात तक ठहरे। इन तीन दिनों में स्नेह मिश्रित द्रव, उष्ण मांस रस युक्त भात खाकर विरेचन लेवे। एक दिन जिसने आराम किया ऐसा पुरुष पहिले की भांति भोजन करके वमन (कारक द्रव्य) पीये ॥ ८०-८१ ॥ स्याच्चसंशोधनार्थायै वृत्तिः स्नेहे विरिक्तवत् । संशमन के उद्देश्य से स्नेहपान करने में विरेचन लिये हुए के समान व्यवहार करना चाहिये । विचारणा का प्रयोग— स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्ठाश्च ये नराः ॥ ८२ ॥ कृशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा । लाव-तित्तिर-मायूर-हांस-वाराह-कौक्कुटाः ॥ ८३ ॥