भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

१७० चरकसंहिता [अ० १३ पाञ्चप्रसृतिकी पेया पायसो माषमिश्रकः ॥ ८९ ॥ क्षीरसिद्धो बहुस्नेहः स्नेहयेदचिरात्ररम् । सर्पिस्तैल-वसा-मज्जा-तण्डुल-प्रसृतैः शृता ॥ ९० ॥ पाञ्चप्रसृतिकी पेया पेया स्नेहनमिच्छता । आगे कही जाने वाली 'पांचप्रसृतिका पेया' को पीकर मनुष्य शीघ्र ही स्निग्ध बन जाता है । उड़दों को चावलों में मिलाकर घी आदि स्नेह में खूब भून कर दूध में पकाई (घी से युक्त) खीर जल्दी ही स्निग्ध कर देती है। पांचप्रसृति की पेया-घी, तैल, वसा, मज्जा और चावल प्रत्येक आठ आठ तोले लेकर छः गुने जल में पकावे । इसका नाम 'पाञ्चप्रसृतिकी पेया' है। स्नेहन की इच्छा करने वाले व्यक्ति को इसका सेवन करना चाहिये ॥८९-९०॥ ग्राम्यानूपौदकं मांसं गुडं दधि पयस्तिलान् । कुष्ठी शोथी प्रमेही च स्नेहने न प्रयोजयेत् ॥ ९१ ॥ स्नेहैर्यथास्वं तान् सिद्धैः स्नेहयेदविकारिभिः । पिप्पलीभिर्हरीतक्या सिद्धैस्त्रिफलयाऽपि वा ॥ ९२ ॥ कुष्ठ रोगी, शोथ (सोज) रोगी, प्रमेह रोगी-इनके स्नेहन के लिए ग्राम्य निन्दित मांस, जलीय मांस, गुड़, दही, दूध और तिल इनका प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्योंकि ये वस्तुयें इनको बढ़ाती हैं। इन रोगियों के लिये, इन रोगों को नाश करने वाली औषधियों से सिद्ध किये हुए घृत आदि स्नेह, एवं इन रोगियों के लिये विकार न करने वाले स्नेहों से इनकी चिकित्सा करनी चाहिये । अथवा पिप्पली के कल्क या हरीतकी (हरड़) के कल्क अथवा त्रिफला के कल्क द्वारा सिद्ध घृतादि स्नेह द्वारा कुष्ठ-रोगी, शोथ-रोगी, प्रमेह- रोगी का स्नेहन करना चाहिये ॥ ९१-९२ ॥ द्राक्षाऽमलक-यूषाभ्यां दध्ना चाम्लेन साधयेत् । व्योषगर्भं भिषक् स्नेहं पीत्वा स्निह्यति तन्नरः ॥ ९३ ॥ द्राक्षायूष, आंवले का यूष, और खट्टी दही (ये मिलित चार भाग) सोंठ, मरिच और पिप्पली (मिलित एक भाग) इनका कल्क डाल कर उचित मात्रा से घृत सिद्ध करना चाहिये। इस घृत के पान करने से मनुष्य का स्नेहन होता है ॥ ९३ ॥ यव-कोल-कुलत्थानां रसाः क्षीरं सुरा दधि । क्षारः सर्पिश्च तत्सिद्धं स्नेहनीयं घृतोत्तमम् ॥ ९४ ॥ जौ, बेर, कुलथी, प्रत्येक का क्वाथ (रस), दूध, दही और मद्य, क्षार