भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १७१ और घी, इनको मिला कर घी सिद्ध करना चाहिये । यह स्नेहन के लिये श्रेष्ठ है ॥ ६४ ॥ तैल-मज्ज-वसा-सर्पिर्बदर-त्रिफला-रसैः । योनि-शुक्र-प्रदोषेषु साधयित्वा प्रयोजयेत् ॥ ६५ ॥ तैल, वसा, मज्जा, घी, बेर और त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा, आंवला ) इनका रस ( क्वाथ ) में ( पृथक् २ वा मिलित चारों स्नेह सिद्ध करने चाहिये ) । यह स्नेह योनिरोग और वीर्यरोगों में स्नेहन कार्य के लिये उपयोगी हैं ॥६५॥ गृह्णात्यम्बु यथा वस्त्रं प्रस्रवत्यधिकं यथा । तथाऽग्निर्जीर्यति स्नेहं तथा स्रवति चाधिकम् ॥ ६६ ॥ जिस प्रकार वस्त्र पानी का उचित मात्रा का ही ग्रहण करता है और अधिक पानी निकल जाता है; इसी प्रकार अग्नि स्नेह की योग्य मात्रा को ही जीर्ण करतो है, अधिक मात्रा निकल जाती है ॥६६॥ यथा वाऽक्लेद्य मृत्पिण्डमासिक्तं त्वरया जलम् । स्रवति संस्रते स्नेहस्तथा त्वरितसेवितः ॥ ६७ ॥ लवणोपहिताः स्नेहाः स्नेहयन्त्यचिरान्नरम् । तद्ध्यभिष्यन्द्यरूक्षं च सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ॥ ६८ ॥ स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमतरेत् ॥ ६६ ॥ जिस प्रकार मिट्टी के ढेले पर जल्दी से गिरा हुआ बहुतसा पानी, ढेले को गीला करके बह जाता है, और ढेला गलने लगता है, उसी प्रकार जल्दी से अधिक मात्रा में पिया स्नेह जल्दी से गुदा मार्ग से बाहर बह जाता है । जितने भी स्नेह कहे हैं, वे सब सैन्धव-लवण के साथ सेवन करने से मनुष्य को शीघ्र ही स्निग्ध कर देते हैं । क्योंकि नमक अभिष्यन्दि, ( द्रवकारक ) अरूक्ष, सूक्ष्म, उष्ण और व्यवायी गुण वाला है । ❉ संशोधन करने से पूर्व स्नेहन करना चाहिये । इसके पीछे स्वेदन करना चाहिये । स्नेह और स्वेदन कर चुकने पर पीछे संशोधन अथवा संशमन चिकित्सा करनी चाहिये ॥६७-६६॥ ❉ अभिष्यन्दि होने से दोषसमूह को तोड़ता है । रूक्ष न होने से स्नेहन करता है । सूक्ष्म होने से शरीर के सूक्ष्म भागों में घुस जाता है । गरम होने से पिये हुए स्नेह को शीघ्र जीर्ण करता है । व्यवायी होने से स्नेह के साथ सारे शरीर में फैल जाता है ।