भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१७२ चरकसंहिता [ अ० १४ तत्र श्लोकः । स्नेहाः स्नेहविधिः कृत्स्नो व्यापत् सिद्धिः सभेषजा । यथाप्रश्नं भगवता व्याहृतं चान्द्रभागिना ॥ १०० ॥ स्नेहों के प्रकार, सम्पूर्ण स्नेहविधि, स्नेह की व्यापत्तियाँ और उनकी भेषज-औषध समेत सिद्धि भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश के प्रश्नानु- सार सब कह दी ॥१००॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के स्नेहाध्यायो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ चतुर्दशोऽध्यायः । अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब (स्नेह कर्म के उपरान्त) स्वेद सम्बन्धी अध्याय का व्याख्यान करते हैं, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ अतः स्वेदाः प्रवक्ष्यन्ते यैर्यथावत्प्रयोजितैः । स्वेदसाध्याः प्रशाम्यन्ति गदा वातकफात्मकाः ॥ ३ ॥ अब स्वेद विधियों का उपदेश करेंगे, जिनका उचित प्रकार से करने पर स्वेदन से शान्त होने वाले, वात-कफ-जन्य रोग शान्त हो जाते हैं ॥ ३ ॥ स्नेहपूर्वं प्रयुक्तेन स्वेदेनाऽऽवर्जितेऽनिले । पुरीष-मूत्र-रेतांसि न सज्जन्ति कथञ्चन ॥ ४ ॥ पहले स्नेहन कार्य करके वायु को शमन कर लेने पर शरीर में मल, मूत्र और वीर्य ये किसी भी प्रकार रुके नहीं रहते ॥ ४ ॥ शुष्काण्यपि हि काष्ठानि स्नेहस्वेदोपपादनैः । नमयन्ति यथान्यायं किं पुनर्जीवतो नरान् ॥ ५ ॥ सूखे हुए काठ (बांस आदि लकड़ियां) भी स्नेहन और स्वेदन द्वारा मन के अनुसार मोड़ी या सांधी की जा सकती हैं, फिर जीवित (रसयुक्त और कोमल) मनुष्यों को वैद्य क्या स्नेहन और स्वेदन द्वारा इच्छानुसार परिवर्तित नहीं कर सकेगा ? ॥ ५ ॥ रोगर्तु-व्याधितापेक्षो नात्युष्णोऽतिमृदुर्न च ।