भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १४] सूत्रस्थानम् १७३ द्रव्यवान् कल्पितो देशे स्वेदः कार्यकरो मतः ॥ ६ ॥ व्याधि, काल, रोगी पुरुष, इच्छा इनके अनुसार न बहुत गरम, न बहुत कोमल, उस-उस रोग को नाश करने वाले द्रव्यों द्वारा, स्वेदन करने योग्य स्थानों से दिया गया स्वेद कार्य करने में समर्थ होता है ॥ ६ ॥ व्याधौ शीते शरीरे च महान् स्वेदो महाबले । दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्यमे मध्यमो हितः ॥ ७ ॥ वातश्लेष्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इष्यते । सिग्ध-रूक्षस्तथा स्निग्धो रूक्षश्चाप्युपकल्पितः ॥ ८ ॥ शीत रोग में और शीतशरीर में महाबलवान् पुरुष के लिये महास्वेद जिसे शरीर सहन कर सके उतना ही देना चाहिये । शीत गोग और शीत शरीर वाले निर्बल पुरुष में दुर्बल स्वेद देना चाहिये । 'मध्यम बल' पुरुष में शीत व्याधि और शात शरीर में 'मध्यम स्वेद' देना चाहिये । वात-कफ-जनित व्याधि में स्निग्व और रूक्ष द्रव्यो से बनाया स्निग्ध-रूक्ष स्वेद देना चाहिये । केवल वातजन्य व्याधियों में स्निग्ध पदार्थों से स्निग्ध स्वेद देना चाहिये । केवल कफजन्य व्याधि में रूक्ष पदार्थों से रूक्ष स्वंद देना चाहिये ॥७-८॥ आमाशयगते वाते कफे पक्वाशयाश्रिते । रूक्षपूर्वो हितः स्वेदः स्नेहपूर्वस्तथैव च ॥ ९ ॥ वृषणौ हृदयं दृष्टी स्वेदयेन्मृदुनैव वा । मध्यमं वङ्क्षणौ शेषमङ्गावयवमिष्टतः ॥ १० ॥ वायु यदि आमाशय ( कफस्थान ) में पहूँचो हो तो प्रथम स्नेहकर्म न करके रूक्ष कर्म करे जिससे कफ निकल जाय । फिर वायु को शान्त करने के लिए स्नेहन कार्य करे । इसी प्रकार जब कफ पक्वाशय ( वात स्थान ) में पहुंचा हो तब पहिले रूक्ष कार्य न करके स्नेहन कार्य करे (जिससे कि वायु की शान्ति हो फिर कफ की शान्ति के लिये रूक्ष कार्य करे ) हृदय, आंख, इनका मृदु स्वेद द्वारा स्वेदन करना चाहिये । यदि दूसरी चिकित्सा से कार्य चल जाय, तो स्वेद बिलकुल न करे । वंक्षण स्थित रांग में वंक्षणो में मध्यम स्वेद देना चाहिये । शेष अगों को ( रोगी की ) इच्छानुसार स्वेदन करे ॥१०॥ सुशुद्धैर्लकचैः पिण्ड्या गोधूमानामथापि वा । पद्मोत्पल-पलाशैर्वा स्वेद्यः संवृत्य चक्षुषी ॥ ११ ॥ मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजनैरपि । जलार्द्रेर्जलजैर्हस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ॥ १२ ॥ धूल आदि दूषक पदार्थों से रहित, रूई से, रूई के वस्त्रो से अथवा गेहूँ