भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 208

१६० चरकसंहिता [ अ० १५ ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भिरभिमन्त्रितां मधु-मधुक- सैन्धव-फाणितोपहितां मदन-फल-कषाय-मात्रां पाययेत् ॥ ६ ॥ फिर मनुष्य को स्नेह एवं स्वेदन क्रिया से युक्त कराकर, सुखपूर्वक बिठाकर, पहिले दिन का खाया भोजन जीर्ण होने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके, शरीर पर चन्दन-अगरु आदि द्रव्य लगाकर, माला पहिना कर, उत्तम-स्वच्छ वस्त्र पहिने हुए, देवता, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध और वैद्य की पूजा कराकर, पुण्य नक्षत्र, तिथि मुहूर्त में, ब्राह्मणों से मंगल पाठ करवा कर, प्रशस्त मंगल क्रिया- आशीर्वाद मन्त्रों से अभिमन्त्रित शहद, मुलैहटी, सैन्धव नमक, गुड़ से युक्त मदनफल के कषाय को उचित मात्रा में पिलावे ॥६॥ मदनफल-कषाय-मात्राप्रमाणं तु खलु सर्वसंशोधनमात्राप्रमाणानि च प्रतिपुरुषमपेक्षितव्यानि भवन्ति; यावद्धि यस्य संशोधनं पीतं वैकारिक-दोष-हरणायोपपद्यते; न चातियोगायोगाय, तावदस्य मात्रा- प्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ १० ॥ मदनफल के कषाय की मात्रा, तथा सम्पूर्ण संशोधनों की मात्रा प्रत्येक पुरुष को देखकर निश्चित की जाती है। जितनी मात्रा पान करने पर शरीर के विकार जन्य दोषों को बाहर निकाल सके और अतियोग आदि विकार उत्पन्न न करे, उतनी इस संशोधन औषध की मात्रा वैद्य को समझनी चाहिये ॥ पीतवन्तं तु खल्वेनं मुहूर्तमनुकाङ्क्षेत्। तस्य यदा जानीयात्स्वेद- प्रादुर्भावेण दोषं प्रविलयनमापद्यमानं, लोमहर्षेण च स्थानेभ्यः प्रच- लितं, कुक्षिसमाध्मापनेन च कुक्षिमनुगतं, हृल्लासास्यस्रवणाभ्यामपिचो- र्ध्वमुखीभूतमथास्मै जानुसममसम्बाधं सुप्रयुक्तास्तरणोत्तरप्रच्छदोप- धानं स्वापाश्रयमासनमुपवेष्टुं प्रयच्छेत् ॥ ११ ॥ प्रतिग्रहांश्चोपचारयेत्—ललाटप्रतिग्रहे पार्श्वोपग्रहणे नाभिप्रपीडने पृष्ठोन्मर्दने चानपन्नपनीयाः सुहृदोऽनुमताः प्रयतेरन् ॥ १२ ॥ उचित मात्रा में वमन-औषध पिलाकर कुछ काल तक एकाग्र चित्त से ध्यानावस्थित होकर प्रतीक्षा करे और जब पसीना उत्पन्न होकर दोष निकल जावे, शरीर में रोमांच हो तब दोष को अपने स्थान से चलायमान समझे। जब उदर में अफारा प्रतीत हो, उस समय दोष को पेट में आया समझे। जब वमन की इच्छा, और मुख से थूक गिरने लगे उस समय दोष को एकत्र होकर ऊपर की ओर आता हुआ जानना चाहिये। इसके पीछे रोगी मनुष्य को घुटने उठा- कर मिलाकर, बैठने को उत्तम गद्दे और चद्दर तथा तकिये से युक्त खाट देवे।