भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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( मथानी ), मृगछाल, पुराने ( परन्तु साफ़ धुले ) वस्त्र, सूत, कपास, रूई, ऊन तथा लेटने या बैठने के साधनों ( खाट, तकिया, आसन ) के पास में पानी बरतने का गंगासागर, पीकदान, और सुन्दर सफेद चांदनी की भांति श्वेत चादर और तकिया लगा पलंग, सुखपूर्वक बैठने के लिये गद्दी, तकिया या आराम- कुर्सी, एवं स्नेहन, स्वेदन अभ्यंग, प्रलेप, स्नान, अनुलेपन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन, मूत्रत्याग ( पेशाब घर ) का स्थान, मल- त्याग का स्थान ( संडास ), उत्तम एवं सुखकारक तथा साधनयुक्त बनावे । स्वच्छ धुली, चिकनी, खुरदरी, मध्यम रूप की पत्थर की शिला ( सिल, दवाई आदि पीसने के लिये ) एवं कैंची, फांवड़ा गण्डासा, दरांती आदि शस्त्र ये सब पदार्थ एकत्र करे । धूमनेत्र-धूम्रनलिका, और उत्तर बस्ति की नलिका, बुहारनी ( झाडू ), तराजू, द्रव मापने के लिये पात्र, घी, तैल, वसा, मज्जा, मधु, राव ( आधा पका गुड़ ), नमक, ईंधन, पानी, मधु, सीधु, सुरा, कांजी, तुषोदक, मैरेय, मेदक, दहो, दही का पानी, छाछ, धान्य, कांजी, आठों प्रकार के मूत्र, शालि ( हेमन्त धान्य ), साठो चावल, मूंग, उड़द, जौ, तिल, कुलत्थी, बेर, किशमिस, फालसा, हरड़, आंवला, बहेड़ा और नाना प्रकार के स्नेह एवं स्वेदन के साधन, वमन, विरेचन के पदार्थ, संग्रहणीय, दीपनीय, पाचनीय, शामक, वातनाशक गण की औषधियां, तथा इनके अतिरिक्त और भी जो साधन या द्रव्य आपत्तियों को दूर करने वाले हों, उनको और जो उपयोग के लिये आवश्यक प्रतीत हों, उन सबका एकत्र करना चाहिये ॥ ७ ॥ ततस्तं पुरुषं यथोक्ताभ्यां स्नेहस्वेदाभ्यां यथार्हमुपपादयेत् । तं चेदस्मिन्नन्तरे मानसः शारीरो वा व्याधिः कश्चित्तीव्रतरः सहसाऽभ्या- गच्छेत्तमेव तावदस्योपावर्तयितुं यतेत । ततस्तमुपावर्त्य तावन्तमेवैनं कालं तथाविधेनैव कर्मणोपचारयेत् ॥ ८ ॥ साधन द्रव्य एकत्र करने के उपरान्त पुरुष को पहिले कही हुई विधि से स्नेह एवं स्वेदन क्रिया करनी चाहिये । स्नेहन और स्वेदन किया करते हुए बीच में यदि सहसा कोई भयानक तीव्र, शारीरिक या मानसिक व्याधि उत्पन्न हो जाय तो स्नेहन और स्वेदन बन्द करके प्रथम उत्पन्न व्याधि का प्रतीकार करना चाहिये । इस उपस्थित रोग के प्रतीकार में जितने दिन लगें, उतने दिनों तक रोग को आराम करना चाहिये ॥८॥ ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं प्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्नि- द्विज-गुरु-वृद्ध-वैद्यानर्चितवन्तं, इष्टे नक्षत्र-तिथि-करण-मुहूर्ते कारयित्वा