भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 639 में से

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पृष्ठ 206

१८८ चरकसंहिता [अ० १५ सुप्रतिविहित-तृण-शरण-पानीयां, जलपाड्याचमनीयोदकोष्ठमणिक-घट- पिठर-पर्योग-कुम्भी-कुम्भ-कुण्ड-शराव-दर्वी-कटोदञ्चन-परिपचन-मन्थान- चर्म-चेल-सूत्र-कार्पासोर्णादीनि च, शयनासनादीनि चोपन्स्त-भृङ्गार- प्रतिग्रहाणि सुप्रयुक्तास्तरणोत्तर-प्रच्छदोपधानानि स्वापाश्रयाणि संवेश- नोपवेशन-स्नेह-स्वेदाभ्यङ्ग-प्रदेह-परिषेकानुलेपन-वमन-विरेचना-स्थापना- नुवासन-शिरोविरेचन-मूत्रोच्चार-कर्मणामुपचारसुखानि, सुप्रक्षालितोप- धानांश्च सुश्लक्ष्ण-खर-मध्यमा दृषदः, शस्त्राणि चोपकरणार्थानि, धूमनेत्रं च, बस्तिनेत्रं चोत्तरवस्तिकं च, कुशहस्तकं च, तुलां च, मानभाण्डं च, घृत-तैल-वसा-मज्ज-क्षौद्र-फाणित-लवणेंधनोदक-मधु-सीधु-सुरा-सौवी- रक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-दधि-मण्डोदश्विद्धान्याम्ल-मूत्राणि च, तथा शालि-षष्टिक-मुद्ग-माष-यव-तिल-कुलत्थ-बदर-मृद्वीका-काश्मर्य-परूषका- भयामलक-बिभीतकानि, नानाविधानि च स्नेहस्वेदोपकरणानि द्रव्याणि, तथैवोर्ध्वहरानुलोमिकोभय-भाञ्जि संग्रहणीय-दीपनीय-पाचनीयोपशम- नीय-वातहराणि संख्यातानि चौषधानि, यच्चान्यदपि किंचिद् व्यापदः परिसंख्यायोपकरणं विद्यात्, यच्च प्रतिभांगार्थं; तत्तदुपकल्पयेत् ॥ ७ ॥ इस के उपरान्त पवित्र शुद्ध स्वभाव, निर्मल आचरण के, रोगी से प्रेम रखने वाले, कर्मकुशल, सेवाकर्म में दक्ष, अपने २ कर्म में कुशल ( शिक्षित ) रसोई बनाने में होशियार रसोइये, स्नान कराने वाले, हाथ पांव मलने वाले, शरीर को पकड़ थाम कर खड़ा करने वाले, बिठानेवाले, औषध-दवाई पीसने- वाले सब कार्यों में अनुकूल नौकर, गाने बजाने में चतुर, स्तुतिपाठ करने वाले, श्लोक, गाथा, कहानी, आख्यायिका, बात-चीत, इतिहास, पुराण आदि सुनाने वाले, अभिप्रायों, को उसके इशारों से पहिचाननेवाले, मालिक के मन के अनुकूल, देश, काल को समझने वाले यार-दोस्त, सोसायटी के आदमी वहां रहने चाहियें। इसी प्रकार बटेर, कपिञ्जल ( कबङ्गा ), खरगोश, हरिण; काला हरिण, कालपुच्छ ( हरिण का भेद ), मृगमातृका ( बड़े पेटवाला हरिण, बारहसींगा ), और मेढ़ा इन को भी एकत्र करना चाहिये। दूध देनेवाली, अच्छे शान्त स्वभाव की, रोगरहित, जिसका बछड़ा जीता हो, ऐसी गाय रक्खे। इस गाय के लिये रहने, घास और पानी का अच्छा बन्दोबस्त करे, छोटा पात्र, आचमन का पात्र, पानी रखने का बड़ा पात्र, मणिक ( मटका ), घड़ा, थाली, कड़ाही, बड़ा घड़ा, मजबूत छोटा कलसा, कूंड़ा गहरा बर्तन, तकोरा, ढकन, कड़छी, चटाई, ढांकने का ऊपर का ढकन, तेल पकाने की कड़ाही, रई

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