चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] सूत्रस्थानम् १८७ रजस्, तमस् से निर्मुक्त हुये पुरुषों से ही सम्भव है और इस प्रयोग की सफलता को पूरे पूरे रूप से उपदेश करने के लिये कोई तैयार नहीं। इसी प्रकार ऐसा भी कोई शिष्य नहीं है जो कि इस प्रयोग को यथावत् रूप में जान सके और जानकर प्रयोग ठीक २ प्रकार से कर सके, ऐसा भी कोई आदमी नहीं है, क्योंकि प्रत्येक पुरुष में दोष, औषध, देश समय, बल, शरीर, भोजन, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति, और आयु इनकी स्थिति प्रतिक्षण बदलती रहती है। इन दोष आदि की सूक्ष्म विवेचना निर्मल एवं विशाल बुद्धि वाले पुरुष की भी बुद्धि को चकरा देते हैं, फिर अल्पबुद्धि वाले मनुष्य का तो कहना ही क्या ? इसलिये थोड़ी बुद्धि वाले मनुष्य की बुद्धि को व्याकुल करने के कारण दोनों बाते अर्थात् औष- धियों का उचित प्रयोग और औषध प्रयोग के मिथ्यायोग से उत्पन्न आपत्तियों को सिद्धिस्थान में कहेंगे ॥५॥ इदानीं तावत्सम्भारान्विविधानपि समासेनोपदेक्ष्यामः, तद्यथा- दृढं निवातं प्रवातेकदेशं सुखप्रविचारमनुपत्यकं धूमातपजलरजसामन- भिगमनीयमनिष्टानां च शब्द-स्पर्श-रस-रूप-गन्धानां सोदपानोलूखल- मुसल-वर्चःस्थान-स्नान-भूमि-महानसोपेतं वास्तुविद्याकुशलः प्रशस्तं गृहमेव तावत् पूर्वमुपकल्पयेत् ॥ ६ ॥ इस अध्याय में संशोधन के उपयोगी नाना प्रकार के उपकरणों का संक्षेप से उपदेश करेंगे। सबसे पहिले मकान बनाने की विद्या ( स्थापत्य कर्म या वास्तुविद्या ) को जानने वाला चतुर शिल्पी ऐसा गृह बनाये जो मज़बूत हो, जिसमें खुली वायु सामने से न आकर एक पार्श्व से पर्याप्त मात्रा में आ सके। जिसमें रोगी आराम से घूम-फिर सके, पहाड़ की तराई या पहाड़ पर न बना हो, धुंवा, गरमी, धूप और धूल जिसमें न आ सकें, मन को अच्छे न लगने वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध जहां पर न जा सकें, पानी का घड़ा, ऊखल, मूसल, मलत्याग का स्थान, स्नानघर, रसोई, पाकशाला साथ हों ॥६॥ ततः शील-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य-प्रादक्षिण्योपपन्नानुपचार-कुश- लान् सर्वकर्मसु पर्यवदातान् सूपौदन-पाचक-स्नापक-संवाहकोत्थापक- संवेशकौषधपेषकांश्च परिचारकान् सर्वकर्मस्वप्रतिकूलान्, तथा गीत- वादित्रोल्लापक-श्लोक-गाथाख्यायिकेतिहास - पुराण-कुशलानभिप्रायज्ञान- नुमतांश्च देशकालविदः परिषद्वद्यांश्च, तथा लावक-पिञ्जल-शश-हरिणैण- कालपुच्छक-मृग-मातृकोरभ्रान्, गां दोग्ध्रीं शीलवतीमनातुरां जीवद्वत्सां