चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६६ चरकसंहिता [ अ० १६ संशोधन कार्य के अनन्तर 'चिकित्सा प्राभृतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः । नरं विरेचयति यं स योगात्सुखमश्रुते ॥ ३ ॥ यं वैद्यमानी त्वबुधो विरेचयति मानवम् । सोऽतियोगादयोगाच्च मानवो दुःखमश्रुते ॥ ४ ॥ चिकित्सा-प्राभृत चिकित्सा में कुशल या साधन सम्पन्न विद्वान्, ज्ञानवान्, शास्त्रवान्, आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन किया हुआ, चिकित्सा-कार्य में कुशल वैद्य जिस मनुष्य को वमन, विरेचन द्वारा संशोधन कराता है, वह मनुष्य वमन और विरेचन के सम्यक् योग से सुख भोगता है । अपने को वैद्य मानने वाला मूर्ख वैद्य जिस मनुष्य का वमन विरेचन द्वारा संशोधन कराता है वह मनुष्य वमन-विरेचन के अयोग या अतियोग के कारण दुःख भोगता है ॥३-४॥ दौर्बल्यं लाघवं ग्लानिर्व्याधीनामणताऽरुचिः । हृद्वर्णशुद्धिः क्षुत्तृष्णा काले वेगप्रवर्तनम् ॥ ५ ॥ बुद्धीन्द्रियमनःशुद्धिर्मारुतस्यानुलोमता । सम्यग्विरिक्तलिङ्गानि कायाग्नेश्चानुवर्तनम् ॥ ६ ॥ सम्यग् विरेचन के लक्षण—शरीर में कमजोरी आना, हलकापन, शरीर में ग्लानि (प्रसन्नता का अभाव), रोगों का घटना, भोजन में अनिच्छा, हृदय का शुद्ध होना, रंग का निखरना, भूख प्यास, समय पर वेगों का उपस्थित होना, बुद्धि-इन्द्रिय और मन की शुद्धता, प्रसन्नता, अपान वायु का नीचे को जाना और जाठराग्नि का क्रमशः बढ़ना ये सम्यग् योग के लक्षण हैं ॥ ५-६ ॥ ष्ठीवनं हृदयाशुद्धिरुत्क्लेशः श्लेष्मपित्तयोः । आध्मानमरुचिश्छर्दिर्दौर्बल्यमलाघवम् ॥ ७ ॥ जङ्घोरुसदनं तन्द्रा स्तैमित्यं पीनसागमः । लक्षणान्यविरिक्तानां मारुतस्य च निग्रहः ॥ ८ ॥ विरेचन के अयोग के लक्षण—मुख से थोड़ा २ थूक या ओषध का बाहर आना, हृदय की जड़ता, वमन आने की भांति कफ और पित्त का मुख में आना, पेट में अफारा, भोजन में अनिच्छा, वमन की इच्छा, शरीर में निर्ब- लता का अनुभव न होना, शरीर में भारीपन, जांघ और टांग में पीड़ा, नींद का भान, शरीर के अंगो का गीले वस्त्र के तुल्य ठंडा प्रतीत होना, सरदी-जुकाम होना, और अपान वायु का रुक जाना, ये विरेचन के अयोग के लक्षण हैं ॥७-८॥