चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] सूत्रस्थानम् १८५ शरीर स्वाभाविक रूप में न आय, तब तक वमनान्तर की विधि करे। जब बल और वर्ण आजाय, मन भी स्वस्थ हो जाय, तब सुखपूर्वक सुलाकर, खाया हुआ भोजन भली प्रकार पचने पर, सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराके चन्दन, अगर आदि शरीर में मलकर, माला, स्वच्छ वस्त्र पहिना कर, सुन्दर बना कर, आभूषणों से आभूषित करके, मित्रों को दिखाकर, जाति, भाई, बन्धुओं को दिखाये और फिर नित्य के उचित आहार-विहार करने की छूट देदे । इस उपरोक्त विधि से राजा अथवा राजा के समान या बहुत धनी आदमी ही संशोधन करवा सकता है। दरिद्र निर्धन व्यक्ति को जब रोग हो जाय और विरेचन लेने का अवसर हो, तो उस समय कठिन उपकरणों को इकट्ठा करना छोड़कर दवाई पान करावे। सब मनुष्यों को सब साधन नहीं जुट सकते और निर्धन व्यक्तियों को भयंकर रोग भी नहीं सताते ऐसा नहीं, आरत्ति काल (रोगावस्था) में मनुष्य जो भी औषध, वस्त्र या खान-पान कर सके, वह यथाशक्ति उसे करना चाहिये। मल- नाशक, रोगनाशक, बल, कान्ति को बढ़ाने वाले संशोधन औषध को पीकर मनुष्य दीर्घायु होता है ॥ २४ ॥ तत्र श्लोकाः—ईश्वराणां वसुमतां वमनं सविरेचनम् । संभारा ये यदर्थं च समानीय प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥ यथा प्रयोज्यं या मात्रा यद्योगस्य लक्षणम् । योगातियोगयोर्यच्च दोषा ये चाप्युपद्रवाः ॥ २६ ॥ यदसेव्यं विशुद्धेन यश्च संसर्जनक्रमः । तत्सर्वं कल्पनाध्याये व्याजहार पुनर्वसुः ॥ २७ ॥ इसमें श्लोक हैं—राजाओं के या धनी पुरुषों के वमन, विरेचन कार्य, उप- करण, इनको एकत्र करने का कारण, मात्रा, प्रयोग विधि, अयोग के लक्षण, योग और अतियोग के दोष, और उपद्रव, संशुद्ध व्यक्ति को क्या सेवन करना, किस प्रकार से छोड़ना, ये सब बातें इस 'कल्पनाध्याय' में पुनर्वसु आत्रेय ने कह दीं। इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने उपकल्पनीयो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ षोडशोऽध्यायः । अथातश्चिकित्साप्राभृतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥