चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ चरकसंहिता [ अ० १५ गुरु, कठिन मधुर ) पदार्थों को सेवन करने पर सात दिन पीछे अपने स्वाभाविक भोजन को ग्रहण करे ॥१८॥ अथैनं पुनरेव स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्यानुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं कृत-होम-बलि-मङ्गल-जप्य-प्रायश्चित्तमिष्टति- थि-नक्षत्र-करण-मुहूर्ते ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा त्रिवृत्कल्काक्षमात्रं यथार्हालोडनप्रतिविनीतं पाययेत् प्रसमीक्ष्य दोष-भेषज-देश-काल-बल- शरीराहार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसामवस्थान्तराणि विकारांश्च । सम्यग्विरिक्तं चैनं वमनानन्तरलक्षणोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादये- दाबल-वर्ण-प्रकृति-लाभात् । बलवर्णोपपन्नं चैनमनुपहतमनसमभिस- मीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुप- हत-वरू-संवीतमनुरूपालङ्कारालङ्कृतं सुहृदां दर्शयित्वा ज्ञातीनां दर्शयेत् , अथैनं कामेष्ववसृजेत् ॥ १९ ॥ भवन्ति चात्र--अनेन विधिना राजा राजमात्रोऽथवा पुनः । यस्य वा विपुलं द्रव्यं स संशोधनमहर्हति ॥ २० ॥ दरिद्रस्त्वापदं प्राप्य प्राप्तकालं विरेचनम् । पिबेत्काममसंभृत्य संभारानपि दुर्लभान् ॥ २१ ॥ न हि सर्वमनुष्याणां सन्ति सर्वपरिच्छदाः । न च रोगा न बाधन्ते दरिद्रानपि दारुणाः ॥ २२ ॥ यद्यच्छक्यं मनुष्येण कर्तुमौषधमापदि । तत्तत्सेव्यं यथाशक्ति वसनान्यशनानि च ॥ २३ ॥ मलापहं रोगहरं बल-वर्ण-प्रसादनम् । पीत्वा संशोधनं सम्यगायुषा युज्यते चिरम् ॥ २४ ॥ इसके सात दिन पीछे जब मनुष्य में बल आजाय, तब फिर स्नेहन और स्वेदन कर्म करके, प्रसन्न मन देखकर, रात्रि में सुखपूर्वक सोने पर, पहिले दिन का खाया भोजन भली प्रकार जीर्ण होने पर, अग्निहोत्र, बलि, मंगल, जप, प्रायश्चित्त करके, पवित्र तिथि, नक्षत्र मुहूर्त्त का विचार करके, ब्राह्मणों से मंगल पाठ करा कर त्रिवृत् कल्क ( विरेचन द्रव्य ) निशोथ के चूर्ण की एक अक्ष मात्रा, योग्य द्रव्य में मिलाकर पिलावे । औषध देते समय दोष, औषध मात्रा, देश, समय, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति, आयु और रोगों की विवेचना कर ले । सम्यक् विरेचन होने पर वमन के पीछे की सम्पूर्ण विधि ( धूम्रपान को छोड़कर ) करे । जब तक कि शरीर में बल कान्ति न आय,