भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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७८ चरकसंहिता [अ० २१ तस्मात्स शीघ्रं जरयत्याहारं चातिकाङ्क्षति । विकारांश्चाश्नुते घोरान् कांश्चित्कालव्यतिक्रमात् ॥६॥ एतावुषद्रवकरौ विशेषादग्निमारुतौ । एतौ हि दहतः स्थूलं वनदावो वनं यथा ॥ ७ ॥ मेदस्यतीव संवृद्धे सहसैवानिलादयः । विकारान् दारुणान् कृत्वा नाशयन्त्याशु जीवितम् ॥ ८ ॥ मेदोमांसातिवृद्धत्वाच्चलस्फिगुदरस्तनः । अयथोपचयोत्साहो नरोऽतिस्थूल उच्यते ॥ ६ ॥ इति मेदस्विनो दोषा हेतवो रूपमेव च । निर्दिष्टं, वक्ष्यते वाच्यमतिकार्श्येऽप्यतः परम् ॥ १० ॥ मेद के द्वारा स्रोतों के रुक जाने पर वायु कोष्ठ का आश्रय लेकर गति करता है, इससे अग्नि को बढ़ाता ( तेज करता है ) है, और भोजन को शुष्क करता है। इसलिये अग्नि आहार को शीघ्र जीर्ण कर देती है और अन्य आहार को चाहती है। आहार काल के अतिक्रमण होने से भयानक रोगों को उत्पन्न करती है। ये अग्नि और वायु विशेष रूप से उपद्रव करने वाले हैं। जिस प्रकार की जंगल की आग बन को जला देती है, उसी प्रकार ये वायु और अग्नि मोटे व्यक्ति को जला देते हैं। मेद के बहुत बढ़ने पर एक दम से वायु, पित्त, कफ, भयानक रोगों को उत्पन्न करके जीवन का नाश शीघ्रता से कर देते हैं। मेद के अति बढ़ने से मनुष्य के नितम्ब, उदर और स्तन थल-थल करने लगते हैं। शरीर का आकार और उत्साह शक्ति नष्ट हो जाते हैं। ऐसे पुरुष को अतिस्थूल कहते हैं। ये मेदस्वी पुरुष के दोष, कारण और लक्षण कह दिये इसके आगे अतिकृश व्यक्ति के लक्षण कहते हैं ॥ ५-१० ॥ सेवा-रूक्षान्न-पानानां लङ्घनं प्रमिताशनम् । क्रियातियोगः शोकश्च वेग-निद्रा-विनिग्रहः ॥११॥ रूक्षस्योद्वर्तनं स्नानमभ्यासः प्रकृतिर्जरा । विकारानुशयः क्रोधः कुर्वन्त्यतिकृशं नरम् ॥१२॥ व्यायाममतिसौहित्यं क्षुत्पिपासामहौषधम् । कृशो न सहते तद्वदतिशीतोष्णमैथुनम् ॥ १३ ॥ प्लीहा कासः क्षयः श्वासो गुल्मार्शांस्युदराणि च । कृशं प्रायोऽभिधावन्ति रोगाश्च ग्रहणीगताः ॥१४॥ शुष्क-स्फिगुदर-ग्रीवो धमनी-जाल-सन्ततः ।