चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०१
है; इसी प्रकार वयमें बाल्यावस्था से योवनावस्था पर है और बाल्यावस्था अपर है पर-अपर अपेक्षा से है। अथवा सन्निकृष्ट, और विप्रकृष्ट भेद से पर-अपर भाव होता है। युक्ति योजना दोषादि के अपेक्षा से औषध की भली प्रकार कल्पना करना । संख्या-गिनती, एक, दो, तीन आदि । संयोग-द्रव्यों का परस्पर संयुक्त होना संयोग है। यह संयोग तीन प्रकार का होता है। १ द्वन्द्व (दो का जैसे-लड़ते हुए दो मेढ़ों का), २ सबका (जैसे-एक पात्र में रक्खे उड़दों का), और ३. एककर्मजन्य, (जैसे-वृक्ष पर बैठे कौवे का) यह संयोगजन्य कर्म अनित्य है। विभाग-विभजन, बांटना, भाग करना । संयोग का वियोग या विभाग रूप में ग्रहण होना विभाग है। पृथक्त्व-जिसके द्वारा यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि यह वस्तु घड़े से भिन्न है वह पृथक्त्व है। यह तीन प्रकार का है। १ सर्वथा अभिन्न वस्तुओं का जैसे-मेरु और हिमालय का । २. विजातियों में जैसे- भैंस और सूअर का । ३. विलक्षणताजन्य-विशिष्ट लक्षण युक्त विजातियों से भेद, अनेकता-एक जातीय द्रव्यों के संयोग में रहने वाली भिन्नता का नाम 'अने कता' है, यथा-उड़दों में अनेकता मिलती है, सब उड़द एक समान नहीं होते । परिमाण-मान, तोल, वजन । संस्कार-किसी द्रव्य में जिस क्रिया से गुणान्तर उत्पन्न किया जाता है, उस क्रिया का नाम संस्कार है (संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते )। अभ्यास-किसी द्रव्य या क्रिया का निरन्तर उपयोग करना, व्यवहार करना, अभ्यास कहाता है। इस 'अभ्यास' को शील या निर- न्तर करना या आदत भी कहते हैं। इस प्रकार से पर आदि दस गुणों के लक्षण कह दिये हैं। यदि वैद्य को इनका पूरा ज्ञान न होगा तो चिकित्सा पूर्ण रूप में सफल नहीं हो सकेगी। अब तक रसों के परस्पर संयोगी गुण कहे हैं। अब स्निग्धत्वादि गुण कहते हैं। जो गुण कहे हैं, वे गुण रूप, रस आदि में आश्रित नहीं, अपितु रस के आधारभूत द्रव्य में आश्रित हैं। इसलिये रस के गुणों को भी द्रव्य का गुण समझना चाहिये, रस का नहीं। यथा-मधुर रस, स्निग्ध, शीत, गुरु है, इस का अर्थ यह है कि मधुर रस वाला द्रव्य स्निग्ध, शीत गुरु इन गुणों से युक्त है। गुण गुण का आश्रय करके नहीं रह सकते । इस प्रकार कहना ग्रन्थकार की शैली है। प्रत्येक ग्रन्थ को समझने के लिए ग्रन्थकार के अभि- प्राय को (उस के अभिप्राय के पृथक् होने से), प्रकरण, देश, और काल को भी जानना चाहिये । प्रकरण जैसे—"क्षारः क्षीरं फलं पुष्पम्” यहां पर वनस्पति प्रकरण होने से थूहर का दूध लेना चाहिये, गाय, भैंस का नहीं। देश-शिर शोधन कहने में, 'कृमिव्याधि' अर्थात् शिरोजन्य कृमि रोग में ऐसा समझना