चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१८ चरकसंहिता [ अ० २६ चाहिये, क्योंकि इन के खाने से या तो मृत्यु हो जाती है, अथवा बल, वर्ण, तेज, वीर्य का नाश होता है और बड़े २ रोग तथा नपुंसकता उत्पन्न होती है। इसी पके हुए ट्यो फल को उड़द की दाल, गुड़ और घी के साथ मिलाकर नहीं खाना चाहिये क्योंकि संयोग विरुद्ध है। इसी प्रकार कच्चे आम, बिजौरा, ट्यो, करौंदा, केला, निम्बू, बेर, जंगली आम, कमरख, जामुन, कैथ, इमली, फालसा, अखरोट, पनस (कटहल), नारियल, अनार, आंवला या इस प्रकार के अन्य सब तरल अथवा ठोस सब प्रकार के खट्टे पदार्थ दूध के साथ विरोधी गुण रखते हैं। इसी प्रकार कंगु (नीवार धान्य), जंगली मूंग, मोठ, कुलत्थी, उड़द, या पिष्टी से बने पदार्थ दूध के साथ विरोधी हैं। पद्मोत्तरिका के शाक, को शक्कर, मैरेय, मधु के साथ खाना विरुद्ध है और वायुकारक है। कबूतर को सरसों के तेल में भूनकर खाना विरुद्ध है, वह पित्त को बहुत कुपित करता है। सत्तू को दूध में या खीर में मथकर खाना विरुद्ध है और श्लेष्मा को बढ़ाता है। तिल कल्क के साथ तैयार की हुई चोलाई की भाजी अतीसार रोग को उत्पन्न करती है। बलाका (पक्षी), वारुणी-शराब तथा कुल्माष (धान्य) के साथ विरुद्ध है। इसी बलाका पक्षी को सुअर की चर्बी में भूनकर खाने से शीघ्र मरण होता है। मोर का मांस, एरण्ड की कड़छी (खोंचा, भूनने की लकड़ी) से, एरण्ड की लकड़ियों की आग से, एरण्ड तैल में पकाकर खाने से तुरन्त मार देता है। हलदा कबूतर का मांस, हलद की लकड़ी की बना कड़छी से, हलद की लकड़ियों के आंच में पकाकर खाने से शीघ्र मार देता है। इसी कबूतर के मांस को राख, धूल में मिले हुए शहद में मिलाकर खाने से मृत्यु होती है। मछलियों की चर्बी में अथवा जिस बर्तन में मछलियां पकाई जाती हैं, उसी पात्र में पिप्पली, मकोय या शहद पकाकर खाने से मृत्यु होती है। उष्ण क्रिया करने पर या उष्ण शरीरावस्था में गरम शहद खाना मृत्यु का कारण होता है। एक मात्रा में मधु और घी, मधु और वृष्टि जल, शहद और कमलगट्टा, मधु पीकर गरमपानी, भिलावा और गरमपानी, छाछ में सिद्ध पकाया कसीला, रात की बासी रक्खी मकोय, अंगारों पर शूलाकृत भास (कुक्कुट) पक्षी का मांस ये विरुद्ध होते हैं। ये प्रश्न के अनुसार विरोधी अन्न कह दिये गये ॥ ८१-८२ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः- यत्किंचिद्दोषमुत्क्लेश्य न निर्हरति कायतः । आहारजातं तत्सर्वमहितायोपपद्यते ॥ ८३ ॥