चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २६] २१ सूत्रस्थानम् ३२१ लाचार होकर खाना ये क्रमविरुद्ध है। सुअर आदि का मांस खाकर या गरम अथवा घी आदि खाकर ऊपर शीतल पदार्थों का सेवन करना परिहार विरोधी है। दुष्ट या बुरी (बांस आदि, या मिट्टी के तेल से) लकड़ियों से पकाये, कच्चे-पके, बहुत पके, या जले हुए चावल आदि आहार का खाना पाकविरोधी कहते हैं। खटाई का दूध के साथ संयोग करना यह संयोगविरोधी है। जो आहार मन को नहीं रुचता वह हृदयविरोधी है। जिस आहार में रस उत्पन्न नहीं हुआ वह सम्पद्विरुद्ध है। इसी प्रकार जिस आहार का रस नष्ट हो गया या बिगड़ गया है, वह भी सम्पद्विरुद्ध है। जो भोजन एकान्त में नहीं खाया जाता है वह आहारविधि अर्थात् शास्त्र के विरुद्ध है। इस प्रकार का विरोधी अन्न भी स्वस्थ पुरुष को, जिसकी अग्नि दीप्त हो, युवा पुरुष को, सात्म्य बन गया हो, या अल्पमात्रा में हो अथवा स्नेह एवं व्यायाम से बलवान् बने पुरुष को विरुद्ध भोजन विशेष हानि नहीं करते। विरोधी अन्न के सेवन से निम्न रोग उत्पन्न होते हैं। यथा—नपुंसकता, अन्धापन, वीसर्प, जलोदर, विस्फोटका, उन्माद, भगन्दर, मूर्च्छा, मद, अफारा, गलरोग, पाण्डुरोग, आमविष, किलास, कुष्ठ, संग्रहणी, शोष, रक्तपित्त, ज्वर, पीनस। इसी प्रकार संतति में पहुंचने वाले दोषों एवं मृत्यु का भी कारण विरुद्ध आहार को ही कहते हैं॥ ८३–१०३॥ एषां च खलु परेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामिमे भावाः प्रतिकारा भवन्ति। यथा—वमनं विरेचनं च, तद्विरोधिनां च द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः, तथाविधैश्च द्रव्यैः पूर्वमभिसंस्कारः शरीर- स्येति ॥ १०४ ॥ इस प्रकार के विरुद्ध अन्न पान के सेवन से अथवा अन्य विरोधरूपी कारणों से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा के ये उपाय हैं। यथा—वमन, विरेचन, उक्त रोगों के विरोधी द्रव्यों का शान्ति के लिये उपयोग करना, विरुद्ध आहार- जन्य रोगों के विरुद्धद्रव्यों का निरन्तर उपयोग करके शरीर को संस्कृत करना, अथवा रसायन ओषधियों से शरीर को शुद्ध करना ॥ १०४ ॥ भवति चात्र—विरुद्धाशनजान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् । वमनं शमनं चैव पूर्वं वा हितसेवनम् ॥ १०५ ॥ विरुद्ध आहार से उत्पन्न रोगों को विरेचन, वमन, संशमन क्रिया अथवा व्याधि के निवारणार्थ पहले ही पथ्य तथा रसायनादि का सेवन नष्ट करता है॥ १०५ ॥