भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३९ ( लाल कचनार ), पत्तुर ( शालिञ्च ), चुचुचपर्णिका ( नाड़ीच का भेद ) उंडुरकानी ( आखुपर्णी ), कुमारजीव ( जीवशाक ), क्रोष्टाक ( क्रोष्टा मारिष ), पालं क्य ( पालक ), मारिष कलम्ब, नालिका, आसुरी ( राई ), कुसुमभ ( धनिया ), वृकधूमक, लक्ष्मणा, प्रपुन्नाड़ ( चक्रमर्द ), नलिनी ( कमल की नाल, भिस ), कुठेरक ( तुलसी भेद ), लोणिका ( लूनी ), यवशाक ( खेत पापड़ा ), कूष्माण्डक ( पेठा ), अवल्गुजा ( बावची ), यातु क ( सफेद शाल- पर्णी ), शालकल्याणी, त्रिपत्री ( हंसपादिका ), पीलुपर्णी ( मोरटक, मोरबेल ), इन की भाजी गुरु, रूक्ष और प्रायः करके जब तक पचती नहीं, तब तक पेट में अफरा करती है, मधुर, शीतवीर्य और मल के रेचक है । इनको पानी में भापकर ( बिना बाहर का पानी मिलाये ) रस निकाल कर इस में घी या तैल मिलाकर खाना उत्तम है । सन, कचनार, लाल कचनार और सिम्बल इनके फूल संग्राही है, इसलिये रक्तपित्त में विशेषतः प्रशस्त हैं । न्यग्रोध ( बड़ ), गूलर, पीपल, पिलखन, कमल आदि के पत्ते कषाय रस, स्तम्भक,शीत तथा पित्तातिसार में हित-कारी हैं । वत्साडनी ( गिलोय ) की भाजी वायु नाशक, गण्डीर ( शमठ, कडुवा जिमीकन्द ) और चीता की भाजी कफनाशक, श्रेयसी ( गज पिप्पली ), बिल्वपर्णी और बेल के पत्तों की भाजी वायुनाशक है । भण्डी ( भिण्डो ), शतावर, बला, खरैटी, जीवन्ती, पर्वरणी ( इन्द्रवारुणी ), पर्वपुष्पी इन की भाजी वातपित्तनाशक है । लांगली (कलिहारी) की, लाल एरण्ड की भाजी तिक्त, रेचक और लघु है । तिक्त अम्ल वेतस ( या बेंत का शाक ), या एरण्ड की भाजी वायुकारक, कटु, तिक्त, अम्ल तथा रेचक है । कुसुमभ की भाजी रूक्ष, अम्ल, उष्ण, कफनाशक, पित्तवर्धक है । त्रपुस ( खीरा ), उर्वारुक ( ककड़ी ), स्वादु गुरु, अवष्टम्भ करने वाली और शीतल है । इनमें खीरा मुखप्रिय ( खाने में स्वादु ), रूक्ष और बहुत मूत्र लाने वाले हैं । पका हुआ उर्वारुक ( ककड़ी), प्यास, जलन थकान की पीड़ा को नष्ट करती है । अलाबूं ( तूंबी, घीया, आल ) मल का रेचक, रूक्ष, शीतल और गुरु है । चिर्भटी ( ककड़ी ), एवों- रुक भी रेचक हैं। पेठा कद्दू-क्षारयुक्त, मधुर, अम्ल, लघु, मल मूत्र का रेचक, त्रिदोषनाशक है १ । १. कच्चे और पक्के कूष्माण्ड के गुणों मे अन्तर है । यथा- “पित्तघ्नं तेषु कूष्माण्डं बालं मध्यं कफावहम् । पक्वं लघूष्णं स क्षारं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ सर्वदोषहरं हृद्यम्-॥”