चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] ३४० चरकसंहिता [ अ० २७
केलुट ( केंबुक कन्द शाक ) और कदम्ब नन्दी माषक ( उन्दी मान- वक ), ऐन्द्रक इन की भाजी स्वच्छ, गुरु, शीतल, कफकारक है। नीला कमल कषाय रस और रक्त पित्तनाशक है। ताल प्रलम्ब ( ताड़ का अंकुर ), खर्जूर, तालशस्य ( ताल के सिर की मज्जा ) रक्त-पित्त और क्षयरोगनाशक है। तरूट ( तिरट कन्द ), बिस वा भिस, कमल की दण्डी, लाल कमल का कन्द, कौंचादन ( डूकूर कन्द, कमल ), कशेरू, शृंगाटक (सिंघाड़ा) अंकालोद्य ( ह्रस्व उत्पलकन्द ), गुरु, विष्टम्भि और शीतल हैं। कुमुद ( श्वेत कमल ), उत्पल (नीला कमल ) फूल और फल समेत शीतल, मधुर, कषाय रस, कफ वायु के प्रकोपक हैं। पुष्कर का बीज कषाय रस, थोड़ा विष्टम्भ करने वाला, रक्तपित्तनाशक, मधुर रस और मधुर विपाक है। मुंजातक ( औखरपथिक कन्द ) बलकारक, शीतल, गुरु, स्निग्ध, तृप्तिकारक, बृंहण पुष्टि- कारक, वात-पित्तनाशक, मधुर वृष्य है। विदारीकन्द, जीवनीय, बृंहण, वृष्य, स्वर के लिये हितकारी, रसायन में प्रशस्त, बलकारक, मूत्ररेचक, मधुर और शीतल है। अम्ली कन्द ( आसाम में होता है आंवर जाति का कन्द ) ग्रहणी, अर्श में हितकारी, लघु, बहुत गरम, कफ-वातनाशक, संग्राहि और मदात्यय रोग में प्रशस्त है। सरसों का शाक—त्रिदोषकारक मल-मूत्र का अवरोधक है। पिण्डालु ( रतालु ) भी इसी प्रकार का है, परन्तु कन्द जाति का होने से खाने में अच्छा लगता है। सर्पछत्रक (खुम्बी) को छोड़कर अन्य सब इस प्रकार की भाजियां शीतल, पीनस रोग को उत्पन्न करने वाली, मधुर गुरु होती हैं। इस प्रकार से पत्ते, कन्द और फलवाला शाकवर्ग समाप्त हुआ ॥ ८७-१२२ ॥ इति शाकवर्गः ।
अथ फलवर्गः तृष्णा-दाह-ज्वर-श्वास-रक्त-पित्त-क्षत-क्षयान् । वातपित्तमुदावर्त्तं स्वरभेदं मदात्ययम् ॥ १२३ ॥ तिक्तास्यतामास्यशोषं कासं चाऽऽशु व्यपोहति । मृद्वीका बृंहणं वृष्या मधुरा स्निग्धशीतला ॥ १२४ ॥ मधुरं बृंहणं वृष्यं खर्जूरं गुरु शीतलम् । क्षयेऽभिघाते दाहे च वातपित्ते च तद्धितम् ॥ १२५ ॥ तर्पणं बृंहणं फल्गु गुरु विष्टम्भि शीतलम् । परूषकं मधूकं च वातपित्ते च शस्यते ॥ १२६॥