चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६४ चरकसंहिता [ अ० ३० जो पुरुष आयुर्वेद के ग्रन्थ, उनके स्थान, प्रसंग, अध्याय, प्रश्न उनके अवान्तर विषय, वाक्यार्थों और अर्थावयवों का निरूपण कर सकते हों, उनको आयुर्वेद का ज्ञाता मानना चाहिये। आयुर्वेद के ग्रन्थ में वाक्य, अर्थ और अर्थावयव किस प्रकार से कहे जाते हैं ? यह कहते हैं, ऋषिकृत तन्त्र को 'अथ' से 'इति' पर्यन्त समस्त ग्रन्थ को पाठक्रम से पढ़ना वाक्यार्थ होता है। अर्थतत्त्व को बुद्धि से भली प्रकार समझ कर वाणी द्वारा व्यास अर्थात् विभाग, समास, प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण ( दृष्टान्त ), उपनय¹निगमन²तीनों प्रकार ( उत्तम मध्यम और अवमकोटि ) के शिष्य जिस युक्ति से समझ सकें इस प्रकार से कहना वाक्यार्थशः निरूपण कहाता है। तन्त्र में आये हुए कठिन अर्थों को पुनः पुनः व्याख्यानों द्वारा स्पष्ट करना यह 'अर्थावयवशः निरूपण' होता है ॥ १६-१७ ॥ तत्र चेत्प्रष्टारः स्युः-चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानां कं वेदमुप- दिशन्त्यायुर्वेदविदः, किमायुः, कस्मादायुर्वेदः, किं चायमायुर्वेदः शाश्वतोऽशाश्वतश्च । कति कानि चास्याङ्गानि, कैश्चायमध्येतव्यः, किमर्थं चेति ॥ १८ ॥ तत्र भिषजा पृष्टेनैवं चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानामात्मनोऽथ- र्ववेदे भक्तिरादेश्या। वेदो ह्याथर्वणः स्वस्त्ययन-बलि-मङ्गल-होम-नियम- प्रायश्चित्तोपवास-मन्त्रादि-परिग्रहाच्चिकित्सां प्राह, चिकित्सा चाऽऽयुषो हितायोपदिश्यते ॥ १९ ॥ वेदं चोपदिश्याऽऽयुर्वाच्यं; तत्राऽऽयुश्चेतनानुवृत्तिर्जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकोऽर्थः ॥ २० ॥ तत्राऽऽयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः । कथमिति चेदुच्यते-स्वलक्षणतः सुखासुखतो हिताहिततः प्रमाणाप्रमाणतश्च । यतश्चाऽऽयुष्याण्याना- युष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि वेदयत्यतोऽप्यायुर्वेदः ॥ २१ ॥ तत्राऽऽयुष्याण्यनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते तन्त्रेण ॥ २२ ॥ यदि कोई पूछे कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन चारों वेदों में से किस वेद को आयुर्वेद कहते हैं। आयुर्वेद का कौन से वेद के साथ सम्बन्ध है ? आयु क्या है ? आयुर्वेद किस लिये है ? यह आयुर्वेद शाश्वत १. सिद्धान्तापादितस्य साधनधर्मस्य साध्ये पुनः कथनमुपनयः । २. हेतुसाधितसाध्यधर्मकथनं निगमनम् ॥